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शिर्डी से सीधा प्रसारण ,... "श्री साँई बाबा संस्थान, शिर्डी " ... के सौजन्य से... सीधे प्रसारण का समय ... प्रात: काल 4:00 बजे से रात्री 11:15 बजे तक ... सीधे प्रसारण का इस ब्लॉग पर प्रसारण केवल उन्ही साँई भक्तो को ध्यान में रख कर किया जा रहा है जो किसी कारणवश बाबा जी के दर्शन नहीं कर पाते है और वह भक्त उससे अछूता भी नहीं रहना चाहते,... हम इसे अपने ब्लॉग पर किसी व्यव्सायिक मकसद से प्रदर्शित नहीं कर रहे है। ...ॐ साँई राम जी...

Friday, 8 November 2013

गजिन्द्र हाथी

ॐ श्री साँई राम जी 


गजिन्द्र हाथी

एक निमख मन माहि अराधिओ गजपति पारि उतारे ||


सतिगुरु अर्जुन देव जी महाराज बाणी में फरमाते हैं कि हाथी एक पल प्रभु का सिमरन किया तो उसकी जान बच गई| परमेश्वर के नाम की ऐसी महिमा है| पशु-पक्षी जो भी नाम सिमरन करता है उसका जीवन सफल हो जाता है| गजपति (हाथी) दुःख-पीड़ा से व्याकुल था| उसकी चिल्लाहट ने जब कुछ भी न संवारा तो उसने भक्ति और परमात्मा की तरफ ध्यान किया| उसी समय परमात्मा अपनी शक्ति के साथ उसकी सहायता हेतु आ गए| उस हाथी को तेंदुए ने पकड़ रखा था और उसे पानी से बाहर नहीं आने दे रहा था|

हे जिज्ञासु जनो! एकाग्रचित होकर कथा सुनो कि किस तरह हाथी के बंधन मुक्त हो गए| महाभारत के अनुसार कथा इस प्रकार है -

होता एवं ब्रह्मा दो भाई हुए हैं| वह दोनों परमात्मा का सिमरन किया करते थे और इकट्ठे ही रहते थे| एक दिन दोनों सलाह-मशविरा करके एक राजा के पास दक्षिणा लेने गए|

यह मालूम नहीं, क्यों?

किसी कारण या स्वाभाविक ही भाई होता को दक्षिणा ज्यादा मिली तथा ब्रह्मा को कम| ब्रह्मा ने सोचा कि मुझे कम दक्षिणा मिली है तो भाई को ज्यादा, बराबर-बराबर करनी चाहिए| उसने शीघ्र ही सारी दक्षिणा मिला कर एक समान कर दी| उसके दो हिस्से करके भाई को कहने लगा - 'उठा ले एक हिस्सा|'

होता-'नहीं! यह नहीं हो सकता, मैं तो उतना हिस्सा लूंगा जितना मुझे मिला है| दक्षिणा इकट्ठी क्यों की?'

ब्रह्मा-'ईर्ष्या क्यों करते हो?'

होता-ईर्ष्या एवं लालच आप करते हो, जब आप को दक्षिणा कम मिली तो आप ने एक जैसी कर दी| कितनी बुरी बात है, मेरा पूरा हिस्सा दो, लालची!

ब्रह्मा-'मैं लालची हूं तो तुम तेंदुए की तरह हो| जाओ, मैं तुम्हें श्राप देता हूं तुम गंडकी नदी में तेंदुए बन कर रहोगे लालची|'

होता भी कम नहीं था उसने भी भगवत भक्ति की थी और उसने भी आगे से श्राप दे दिया - 'यदि मैं तेंदुआ बनूंगा तो याद रखो तुम भी मस्त हाथी बनोगे तथा उसी नदी में जब पानी पीने आओगे तो तुम्हें पकड़कर गोते देकर मारूंगा, फिर याद करोगे, ऐसे लालच को| तुमने सर्वनाश करने की जिम्मेदारी उठाई है, नीच ज़माने के|

यह कहता हुआ होता अपना हिस्सा भी छोड़ गया तथा घर को आ गया| कुछ समय पश्चात दोनों भाई मर गए और अगला जन्म धारण किया| होता तेंदुआ बना तथा ब्रह्मा हाथी| दोनों गंडकी नदी के पास चले गए| वह नदी बहुत गहरी थी|

हे भक्त जनो! ध्यान दीजिए लालच कितनी बुरी भला है| भाई-भाई का आपस में झगड़ा करा दिया| इतना मूर्ख बनाया कि दोनों का कुल नाश हो गया| वास्तव में अहंकार और लालच बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है| लालच में बंधे हुए लोग दुखी होते हैं| ऐसे ही लालच की अपरंपार में बंधे हुए लोग दुखी होते हैं| ऐसे ही लालच की अपरंपार महिमा है| लालच कभी नहीं करना चाहिए|

ब्रह्मा एक बहुत बड़ा हाथी बना जैसे कि सब हाथियों का सरदार था, कोई हाथी उसके सामने नहीं ठहरता था| वह सब हाथिनों के झुण्ड साथ लेकर इधर-उधर घूमता रहता| वह जंगल का राजा था| ब्रह्मा को जो श्राप मिला था, उसे तो पूरा होना ही था| भगवान की माया अनुसार वह हाथी एक दिन उस गंडकी नदी के पास चला गया| पानी पीया| पानी बहुत ठण्डा था और सारे हाथी प्यासे थे| सबसे आगे वही हाथी था जो पूर्व जन्म में ब्रह्मा था| जब वह पानी पीने के लिए आगे बढ़ा तो आगे उसका भाई तेंदुए का रूप धारण करके बैठा था| उसने ब्रह्मा की टांगें पकड़ कर उसको गहरे पानी में खींचना शुरू कर दिया| वह आगे - आगे गया| जब हाथी डूबने लगा तो उसने चिल्लाना शुरू कर दिया| वह पानी के बीच बिना डूबे खड़ा हो गया| बस सिर और सूंड ही नंगी थी| ऐसा देख कर बाकी हाथी बहुत हैरान हुए, हाथिनें चिल्लाने लगीं, पर हाथी को बाहर निकालने की किसी में समर्था नहीं थी|

तेंदुए ने ब्रह्मा से बदला लेना था| इसलिए वह ज़ोर से उस हाथी को पकड़ कर बैठा रहा| हाथी बल वाला था, उसको भी ज्ञान हो गया कि पिछले जन्म का हिसाब बाकी है| वह अपने आप को बचाने का यत्न करने लगा| वह पानी में सिर न डूबने देता| तेंदुआ भी उस हाथी को डुबोने का यत्न करता|

तेंदुए तथा हाथी को लड़ते हुए कई हजार साल बीत गए| हाथी भूखा रहा, पानी में से वह क्या खाए| तेंदुए का भोजन तो पानी में ही था| हाथी बिना कुछ खाए-पीए कमज़ोर हो गया वह पानी में डूबने लगा तो उसी समय उसने अपनी सूंड ऊपर उठा कर आकाश की तरफ देख कर भगवान को याद किया| उसने प्रार्थना की-हे प्रभु! मैं हाथी की योनि में पड़ा हूं, दया करें कि मैं पानी में न डूबूं| यदि यहां मरा तो जरूर किसी बुरी योनि में जाऊंगा| मेरी प्रार्थना सुनो प्रभु!"

ब्रह्मा (हाथी) ने शुद्ध हृदय से पुकार की, उसी समय परमात्मा ने उसकी प्रार्थना सुनी और स्वयं नदी किनारे आए| सुदर्शन चक्र से तेंदुए की तारें काटी और हाथी को डूबने से बचाया| उसकी हाथी की योनि से मुक्त करवाया, फिर भक्त रूप में प्रगत किया| वह प्रभु का यश करने लगा| तेंदुए का जन्म भी बदल गया|

Thursday, 7 November 2013

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 49

ॐ सांई राम




आप सभी को वर्ल्ड ऑफ साँई ग्रुप की ओर साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम  घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 49

हरि कानोबा, सोमदेव स्वामी, नानासाहेब चाँदोरकर की कथाएँ ।
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Wednesday, 6 November 2013

भक्त सुदामा

ॐ श्री साँई राम जी 



भक्त सुदामा

प्रभु के भक्तों की अनेक कथाएं हैं, सुनते-सुनते आयु बीत जाती है पर कथाएं समाप्त नहीं होतीं| सुदामा श्री कृष्ण जी के बालसखा हुए हैं| उनके बाबत भाई गुरदास जी ने एक पउड़ी उच्चारण की है -
bhagat-sudama-an-introduction


बिप सुदामा दालदी बाल सखाई मित्र सदाऐ |
लागू होई बाहमणी मिल जगदीस दलिद्र गवाऐ |
चलिया गिणदा गट्टीयां क्यों कर जाईये कौण मिलाऐ |
पहुता नगर दुआरका सिंघ दुआर खोलता जाए |
दूरहुं देख डंडउत कर छड सिंघासन हरि जी आऐ |
पहिले दे परदखना पैरीं पै के लै गल लाऐ |
चरणोदक लै पैर धोइ सिंघासन ऊपर बैठाऐ |
पुछे कुसल पिआर कर गुर सेवा की कथा सुनाऐ |
लै के तंदुल चबिओने विदा करै आगे पहुंचाऐ |
चार पदारथ सकुच पठाए |९|९०|

भाई गुरदास जी के कथन अनुसार सुदामा गोकुल नगरी का एक ब्राह्मण था| वह बड़ा निर्धन था| वह श्री कृष्ण जी के साथ एक ही पाठशाला में पढ़ा करता था| उस समय वह बच्चे थे| बचपन में कई बच्चों का आपस में बहुत प्यार हो जाता है, वे बच्चे चाहे गरीब हो या अमीर, अमीरी और गरीबी का फासला बचपन में कम होता है| सभी बच्चे या विद्यार्थी शुद्ध हृदय के साथ मित्र और भाई बने रहते हैं|

सुदामा और कृष्ण जी का आपस में अत्यन्त प्रेम था, वह सदा ही इकट्ठे रहते| जिस समय उनका गुरु उनको किसी कार्य के लिए भेजता तो वे इकट्ठे चले जाते, बेशक नगर में जाना हो या किसी जंगल में लकड़ी लेने| दोनों के प्रेम की बहुत चर्चा थी|

सुदामा जब पढ़ने के लिए जाता था तो उनकी माता उनके वस्त्र के पलड़े में थोड़े-से भुने हुए चने बांध दिया करती थी| सुदामा उनको खा लेता था, ऐसा ही होता रहा|

एक दिन गुरु जी ने श्री कृष्ण और सुदामा दोनों को जंगल की तरफ लकड़ियां लेने भेजा| जंगल में गए तो वर्ष शुरू हो गई| वे एक वृक्ष के नीचे बैठ गए| बैठे-बैठे सुदामा को याद आया कि उसके पास तो भुने हुए चने हैं, वह ही खा लिए जाए| वह श्री कृष्ण से छिपा कर चने खाने लगा| उसे इस तरह देख कर श्री कृष्ण जी ने पूछा-मित्र! क्या खा रहे हो?

सुदामा से उस समय झूठ बोला गया| उसने कहा-सर्दी के कारण दांत बज रहे हैं, खा तो कुछ नहीं रहा, मित्र!

उस समय सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण जी के मुख से यह शब्द निकल गया -'सुदामा! तुम तो बड़े कंगाल हो, चनों के लिए अपने मित्र से झूठ बोल दिया|'

यह कहने की देर थी कि सुदामा के गले दरिद्र और कंगाली पड़ गई, कंगाल तो वह पहले ही था| मगर अब तो श्री कृष्ण ने वचन कर दिया था| यह वचन जानबूझ कर नहीं सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण के मुख से निकल गया, पर सत्य हुआ| सुदामा और अधिक कंगाल हो गया|

पाठशाला का समय खत्म हो गया और सुदामा अपने घर चला गया| विवाह हुआ, बच्चे हुए तथा उसके पश्चात माता-पिता का देहांत हो गया| कंगाली दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी, कोई फर्क न पड़ा| दिन बीतने लगे| श्री कृष्ण जी राजा बन गए, उनकी महिमा बढ़ गई| वह भगवान रूप में पूजा जाने लगे तो सुदामा बड़ा खुश हो का अपनी पत्नी को बताया करता कि हम दोनों का परस्पर अटूट प्रेम होता था|

उसकी पत्नी कहने लगी -'यदि आपके ऐसे मित्र हैं और आप में इतना प्रेम था तो आप उनके पास जाओ और अपना हाल बताओ| हो सकता है कि कृपा तथा दया करके हमारी कंगाली दूर कर दें|'

अपनी पत्नी की यह बात सुन कर सुदामा ने कहा -'जाने के लिए तो सोचता हूं, पर जाऊं कैसे, श्री कृष्ण के पास जाने के लिए भी तो कुछ न कुछ चाहिए, आखिर हम बचपन के मित्र हैं|'

आखिर उसकी पत्नी ने बहुत ज़ोर दिया तो एक दिन सुदामा अपने मित्र श्री कृष्ण कि ओर चल पड़ा| उसकी पत्नी ने कुछ चावल, तरचौली उसको एक पोटली में बांध दिए| सुदामा मन में विचार करता कि मित्र को कैसे मिलेगा? क्या कहेगा? द्वारिका नगरी में पहुंच कर वह श्री कृष्ण जी का दरबार लगता था| प्रभु वहां इंसाफ और न्याय करते थे| सुदामा ने डरते और कांपते हुए द्वारपाल को कहा - 'मैंने राजा जी को मिलना है|'

द्वारपाल-'क्या नाम बताऊं जा कर?'

सुदामा-उनको कहना सुदामा ब्राह्मण आया है, आपके बचपन का मित्र| द्वारपाल यह संदेश ले कर अंदर चला गया| जब उसने श्री कृष्ण जी को संदेश दिया तो वह उसी पल सिंघासन से उठ कर नंगे पांव बाहर को भागे तथा बाहर आ कर सुदामा को गले लगा लिया| कुशलता पूछी तथा बड़े आदर और प्रेम से उसे अपने सिंघासन पर बिठाया और उसके पैर धोए| पास बिठा कर व्यंग्य के लहजे में कहा - लाओ मेरी भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है?

यह कह कर श्री कृष्ण ने सुदामा के वस्त्रों से बंधी हुई पोटली खोल ली और फक्के मार कर चबाने लगे| चबाते हुए वर देते गए तथा कहते रहे, "वाह! कितनी स्वादिष्ट है तरचौली! कितनी अच्छी है भाभी!"

सुदामा प्रसन्न हो गया| श्री कृष्ण ने मित्र को अपने पास रखा तथा खूब सेवा की गई| बड़े आदर से उसको भेजा| विदा होते समय न तो सुदामा ने श्री कृष्ण से अपनी निर्धनता बताते हुए कुछ मांगा तथा न ही मुरली मनोहर ने उसे कुछ दिया| सुदामा जिस तरह खाली हाथ दरबार की तरफ गया था, वैसे ही खाली हाथ वापिस घर को चल पड़ा| मार्ग में सोचता रहा कि घर जाकर अपनी पत्नी को क्या बताऊंगा? मित्र से क्या मांग कर लाया हूं|

सुदामा गोकुल पहुंचा| जब वह अपने मुहल्ले में पहुंचा तो उसे अपना घर ही न मिला| वह बड़ा हैरान हुआ| उसका कच्चा घर जो झौंपड़ी के बराबर घास फूस से बना गाय बांधने योग्य था, कहीं दिखाई न दिया| वह वहां खड़ा हो कर पूछना ही चाहता था कि इतने में उसका लड़का आ गया| उसने नए वस्त्र पहने हुए थे| 'पिता जी! आप बहुत समय लगा कर आए हो|.....द्वारिका से आए जिन आदमियों को आप ने भेजा था, वह यह महल बना गए हैं, सामान भी छोड़ गए हैं तथा बहुत सारे रुपये दे गए हैं| माता जी आपका ही इंतजार कर रहे हैं| आप आकर देखें कितना सुंदर महल बना है|'

अपने पुत्र से यह बात सुन कर तथा कच्चे घर की जगह सुन्दर महल देख कर वह समझ गया कि यह सब भगवान श्री कृष्ण की लीला है| श्री कृष्ण ने मुझे वहां अपने पास द्वारिका में रखा और मेरे पीछे से यहां पर यह लीला रचते रहे तथा मुझे बिल्कुल भी मालूम नहीं पड़ने दिया| महल इतना सुन्दर था कि, उस जैसा किसी दूसरे का शायद ही हो| शायद महल बनाने के लिए विश्वकर्मा जी स्वयं आए थे, तभी तो इतना सुन्दर महल बना| भगवान श्री कृष्ण की लीला देख कर सुदामा बहुत ही प्रसन्न था| उसके बिना कुछ बताए ही श्री कृष्ण जी सब कुछ समझ गए थे|

उस दिन के बाद सुदामा श्री कृष्ण की भक्ति में लग गया और भक्तों में गिने जाने लगा| 

Tuesday, 5 November 2013

राजा बली

ॐ श्री साँई राम जी 


राजा बली


सद्पुरुष कहते हैं, पुरुष को तपस्या करने से राज मिलता है, पर राज प्राप्ति के बाद उसको नरक भोगना पड़ता है, 'तपो राज तथा राजो नरक' इसका मूल भावार्थ यह है कि राज प्राप्ति के पश्चात मनुष्य अहंकारी हो जाता है| अहंकार के साथ कुछ लालच भी आता है| इसलिए फिर कुछ बात नहीं सूझती| उसके कर्म ऐसे हो जाते हैं कि प्रभु उसको फिर सत्य मार्ग पर लगाने के लिए कोई कौतुक रचता है| ऐसा युगों से होता आया है जैसे कि राजा बली की कथा है| भाई गुरदास जी ने भी लिखा है :-

बलि राजा घरि आपणे अंदरि बैठा जग करावै |
बावन रूपी आइआ चारि बेद मुखि पाठ सुणावै |
राजे अंदरि सदिया मंग सुआमी जो तुधु भावै |
अछल छलनि तुधु आइआ सुक्र प्रोहत कहि समझावै |
करों अढाई धरति मंगि पिछहुं दे त्रिहु लोअ न भावै |
दोइ करवा करि तिन लोअ बलि राजा लै मगर मिणावै |
बलि छलि आपु छलाईअनु होइ दिआलु मिलै गल लावै |
दिता राजु पताल दा होइ अधीन भगति जस गावै |
होइ दरवान महां सुखु पावै |३|

बली नाम का एक प्रतापी राजा था| उसके दादा प्रहलाद ने तपस्या की और अमर राज प्राप्त किया| बली का पिता विरोचन भी नेक पुरुष था| बली बड़ा दानी था, कोई भी उसके पास आता तो वह उसे खाली न जाने देता| स्वयं को राजा जनक या हरीशचन्द्र कहलाता| उसने अपने राज में यज्ञ किये तथा अत्यंत दान दिया, उसे अहंकार हो गया कि मेरे जैसा कौन दानी होगा? ब्राह्मणों को दान देकर संतुष्ट कर दिया है|

परमात्मा ने देखा कि एक अच्छे भले आदमी को अहंकार हो गया है, इसका अहंकार अवश्य चकनाचूर करना चाहिए| यह विचार करके भगवान विष्णु ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और राजा बली के दरबार में पहुंच गया| राजा ने आदर से कहा-हे स्वामी! आज्ञा दीजिए, मैं आपकी इस समय क्या सेवा करूं|

बावन (छोटा ब्राहमण रूप) भगवान बोले-हे राजन! मैं तो एक निर्धन ब्राह्मण हूं| मेरा कोई घर नहीं है| केवल एक इच्छा है कि आप कृपा करके मुझे सिर्फ ढ़ाई कदम धरती दे दें ताकि मैं वहां बैठ कर प्रभु का जाप कर लिया करूं आप से और क्या मांगना है| मुझे बस यही चाहिए, आपके द्वार पर बैठा रहूंगा|

यह सुन कर राजा बली हंसा तथा सम्बोधन करके कहने लगा-हे ब्राह्मण! तुम्हारा कद तो छोटा है, पर बली राजा को मजाक बहुत बड़ा करने आ गए हो| राज्य में खुले वन पड़े हैं, अनगिनत धरती पर लोगों ने आश्रम बनाए हैं, क्या तुम्हें किसी ने बैठने नहीं दिया| मेरे राज में मेरी धरती पर तो हर एक को छूट है, वह आश्रम बनाए धरती को जोते, मैं तो कुछ नहीं कहता| यदि मांगना था तो गाय, अनाज, वस्त्र, हीरे-मोती मांगते| यह क्या मांगा है? तुम ब्राह्मण हो यदि कोई और होता तो मरवा देता|

बावन चुप रहा, वह खड़ा मुस्कराता ही रहा| राजा बली बातें करता रहा|

राजा बली का मंत्री बहुत सूझवान था| वह समझ गया कि यह कोई खेल है| प्रभु स्वयं ही कोई परीक्षा लेने आए हैं| उसने राजा से कहा-राजन! यह बावन ब्राह्मण जिसने थोड़ी-सी ढाई कदम भूमि की मांग की है, वास्तव में कोई विष्णु अवतार लगता है|

'आपको छलने के लिए आया है| कोई अद्भुत खेल न करें| जरा सावधानी से रहना चाहिए| इसकी यह बात नहीं माननी चाहिए| क्षमा मांग लेना ठीक है|'

पर राजा बली को अहंकार ने घेरा हुआ था, उसने एक न सुनी तथा कहा "जाओ ढाई कदम भूमि जहां से लेनी है, अधिकार कर लो| फिर कभी मजाक करने न आना|"

राजा बली की यह बात सुन कर बावन अवतार दरबार से बाहर आया तथा अपना शरीर इतना बढ़ा लिया कि दो कदमों में उसने बली राजा की सारी धरती सहित ब्रह्मांड माप लिया तथा आधी पूरी करने के लिए उसके सिर पर पैर आ रखा| बली राजा को होश आया, पर समय निकल गया था| बली को बावन ने पैर से धकेल कर पाताल में भेज दिया तथा कहा, 'यहां राज करो| यह कह कर जब भगवान रूप बावन चला तो बली ने कहा, 'मैं तो यहां राज करूंगा पर आप ने भी तो वचन दिया है कि द्वार के आगे रहोगे| अब वचन से न फिरो और बैठो|' इस बात में भगवान भी छले गए| बापन रूप धारण कर बली के द्वार के आगे बैठ गया| बली पातालपुरी में भक्ति करने लगा|

Monday, 4 November 2013

साखी राजा भक्तों की

ॐ श्री साँई राम जी 


साखी राजा भक्तों की

१. राजा परीक्षित-राजा परीक्षित अर्जुन (पांडव) का पौत्रा और अभिमन्यु का पुत्र था| महाभारत के युद्ध के बाद यह राजा बना| कलयुग में इसकी चर्चा हुई| पांडवों की संतान का यह एक महान पुरुष था, इसको हस्तिनापुर के सिंघासन पर बिठा कर पांचों पांडव द्रौपदी सहित हिमालय पर्वत को चले गए| यह कई साल राज करता रहा| इस बीच प्रजा को बहुत दुःख हुआ| यह कलयुग का मुख्य राजा था|

२. परूरवा - "दूरबा परूरउ अंगरै गुर नानक जसु गाईओ ||"परूरवा एक राजा हुआ था| वह उर्वशी अप्सरा पर मुग्ध हो गया| परूरवा 'ऐल' का पुत्र था| उर्वशी के वियोग में ही तड़पता रहा तथा इधर-उधर भटकता रहा| इसने प्रभु की भक्ति भी की है| इनके वीर्य से उर्वशी से इन राजकुमारों को जन्म दिया था - आयु, अमावस विश्वास, सतायु, द्रिढायु| राजा परूरवा बहुत बड़े महाबली हुए थे और उर्वशी का नाटक कालिदास ने लिखा था|

३. भगीरथ - भगीरथ राजा दलीप का पुत्र तथा राजा अंशमान का पौत्रा था| राजा अंशमान तथा राजा दलीप ने स्वर्ग से गंगा को धरती पर लाने के लिए घोर तपस्या की थी पर वह बीच में ही मर गए तथा उनकी इच्छा पूरी न हो सकी| भगीरथ घोर तपस्या करके गंगा को स्वर्ग से धरती पर लेकर आए, भगवान शिव जी की जटाओं का सहारा लेकर गंगा धरती पर आई| गंगा ने जहानुव ऋषि का आश्रम तथा पूजा की सामग्री बहा दी थी| इस पर जाहनुव ऋषि ने क्रोधित हो कर गंगा को पी लिया था| भगवान शिव जी तथा भगीरथ ने फिर जाहनुव ऋषि को मनाया, उसके पास से गंगा को मुक्त करवा कर धरती पर चलाया तथा भगीरथ ने अपने पूर्वज-पित्रों को जल दिया, जिससे उनका कल्याण हुआ|

४. मानधाता - मानधाता सुयवंशी राजा युवनाशु का पुत्र था| पर इसने मां के पेट से जन्म नहीं लिया, बल्कि राजा के पेट में से (पुरुष के पेट में से) जन्म लिया| यह कथा संक्षेप रूप में इस तरह है - राजा युवनाशु का कोई पुत्र-पुत्री नहीं था| उसने ऋषि-मुनि आमंत्रित करके एक ऋषि के आश्रम में महायज्ञ करवाया| यज्ञ के पश्चात महर्षियों ने पानी का घड़ा मंत्र पढ़ कर रखा| जिसका जल युवनाशु की रानी को पीने के लिए दिया जाना था| रात हुई तो सभी सो गए, ऋषि-मुनि भी सो गए| राजा युवनाशु को प्यास लगी, तो उसने उस मंत्र किए हुए घड़े में से पानी पी लिया| उस जल के कारण राजा के पेट में बच्चा बन गया| पेट चीर कर बच्चे को बाहर निकाला गया| उस बच्चे का नाम मानधाता था| मानधाता ने बिंदरासती से विवाह किया, उसके तीन पुत्र तथा पचास कन्याएं पैदा हुईं| पूर्व जन्म में प्रभु की अटूट भक्ति की थी जिस कारण इसकी बहुत शोभा हुई, यह भक्तों में गिना गया|

५. रुकमांगद - रुकमांगद करतूति राम जंपहु नित भाई
रुकमांगद राजा एकादशी का व्रत रखता था, कहते हैं कि वह ब्रह्मचारी था| यह कभी सपने में भी पराई स्त्री के निकट नहीं जाता था| अपनी स्त्री से बहुत ज्यादा प्यार करता था| एक बार एक अप्सरा उस पर मोहित हो गई, पर इस धर्मी राजा ने उसके प्यार और उसकी सुन्दरता को ठुकरा दिया| एकदशी के व्रत का उसे महत्व बता कर वापिस स्वर्ग लोक भेज दिया| उस दिन से एकादशी का व्रत आरम्भ हो गया| राजा आयु भर एकादशी का व्रत रखता रहा| उसका नाम भक्तों में बड़े आदर से लिया जाता है|

६. रावण-इक लखु पूत सवा लखु नाती ||
     तिह रावण घर दीआ न बाती ||

रावण लंका का दैत्य राजा था| इसकी माता का नाम कोक तथा पिता का नाम पुलसत्य था| यह तीन भाई थे, दूसरे दो भाईयों के नाम कुम्भकर्ण और विभीषण थे| रावण सीता को उठा कर लंका ले गया| श्री राम चन्द्र जी ने चढ़ाई की, युद्ध हुआ तथा रावण मारा गया| रावण के दस सिर थे, वह बली तथा विद्वान था| इसने चार वेदों की व्याख्या की इसके एक लाख पुत्र तथा सवा लाख पुत्रियां थीं, पर अन्याय एवं जुल्म करने के कारण उसकी सोने की लंका, स्वयं तथा पुत्र-पुत्रियां सब खत्म हो गए| सीता का हरण कर के लंका लेकर आना उसका महापाप था|

७. राजा अजय-अजै सु रोवै भीखिआ खाइ ||
    ऐसी दरगह मिलै सजाइ ||

राजा अजय, दशरथ के पिता तथा श्री राम चन्द्र जी के दादा थे| इसने एक साधू को घोड़ों की लीद अंजली भर कर दान कर दी थी| क्योंकि साधू ने उस समय भिक्षा मांगी जब राजा घोड़ों के पास था तथा लीद ही वहां थी| गुस्से में आकर उसने लीद दान में दे दी| साधू ने श्राप दिया तथा लीद कई गुणा रोज़ बढ़ती गई| कहते हैं कि वह लीद का दिया हुआ दान उसको खाना पड़ा, जब वह लीद खाता था तो रोया करता था तथा कहता था कि किसी संत-महात्मा के साथ नाराज होना ठीक नहीं, दिया हुआ दान आगे प्रभु के दरबार में मिलता है|

८. बाबा आदम-भक्त कबीर जी ने भैरऊ राग में बाबा आदम जी का जिक्र किया है|


"बाबा आदम कउ किछु नदरि दिखाई ||
उनि भी भिसति घनेरी पाई ||"
ईसारी धर्म की पुरानी पुस्तक 'अंजील' के मुख्य पात्र बाबा आदम जी हैं| 'अंजील' के अनुसार बाबा आदम जी की कथा इस प्रकार है-खुदा ने पहले मनुष्य बनाया था| खुदा पहले शैतान को भी बना बैठा था| मनुष्य बना कर खुदा ने सभी फरिश्तों (देवताओं) को कहा कि आदम को सलाम करो| सबने सलाम किया, पर शैतान ने सलाम न किया| अदन में स्वर्ग बना कर आदम ने जीवन साथी पहली स्त्री माई हवा को अदन के स्वर्ग बाग में भेज दिया| खुदा ने ज्ञान फल (गेहूं) खाने से आदम और हवा को रोका पर शैतान ने एक दिन आदम की अनुपस्थिति में अकेली हवा को उकसाया| अपनी हेराफेरी का शिकार बना कर कहा कि खुदा ने जो काम की चीज़ खाने वाली है उसे तो खाने से रोक दिया है, ज्ञान फल खा कर देखो, चारों कुण्ट का ज्ञान हो जायेगा, तुम जरूर आदम को कहना और ज्ञान फल खाने के लिए प्रेरित करना, यह कह कर शैतान अलोप हो गया| हवा के दिल में ज्ञान फल खाने की तीव्र इच्छा पैदा हो गई| जब आदम मिला तो हवा ने उसे ज्ञान फल खाने के लिए मना लिया| आदम और हवा ने जब ज्ञान फल खा लिया तो उन्हें स्त्री-पुरुष, काम, मोह, लालच और शर्म आदि का ज्ञान हो गया| उनको अपने नग्न तन के बारे में ज्ञान हुआ तो एक दूसरे से दूर हो कर छिप गए| इस बात का खुदा को पता लग गया| खुदा स्वयं आया और दोनों को एक-दूसरे के निकट करके समझाया-शैतान का कहना मान कर आपने भारी भूल की है, जाओ अब स्वर्ग में नहीं रह सकते| स्त्री-पुरुष बन कर रहो और संतान पैदा करो| खुदा ने शैतान को सर्प योनि का श्राप दे दिया| आदम और हवा के हजारों पुत्र हुए जिन से संसार की जन-संख्या बढ़ी| खुदा का कहना न मानने के कारण आदम गुनाहगार था, इसलिए उसकी औलाद भी गुनाहगार है| उसका उद्धार सत्य तथा सिमरन के सहारे है|

९. अरुण पिंगला - अरुण पिंगला बल वाला पक्षी और भगवान गरुड़ का भाई है| सूर्य का रथवान बना हुआ है| पर यह पिंगला है, पिंगला होने के कारण इसके जीवन में अधूरापन है| बिनता के दो अण्डे हुए| बिनता के पति ने कहा कि हर अण्डा हजार साल से पहले न तोड़ना, पर बिनता ने एक अण्डा पांच सौ साल बाद तोड़ दिया| इसलिए अरुण का शरीर पूरा नहीं बना था| पर गरुड़ का अण्डा हजार साल बाद अपने आप टूटा था, वह पूर्ण पक्षी बना| पूर्व जन्म के श्राप के कारण सूर्य और गरुड़ उसकी कोई सहायता नहीं करते थे|

१०. इन्द्र रो पड़ा-सहंसर दान दे इन्द्र रोआइआया ||
इन्द्र देवताओं का बड़ा राजा था, पर अहल्या के साथ दुष्कर्म करने के कारण शरीर पर हजार भग हो गई थी| इस कष्ट के कारण रोता रहा था| हजार भग का श्राप उसको अहल्या के पति ऋषि गौतम ने दिया था| जैसा कि पीछे गौतम तथा अहल्या की कथा में बताया गया है| इससे शिक्षा मिलती है कि पर-नारी की ओर ध्यान नहीं करना चाहिए|

Sunday, 3 November 2013

शुभ दीपावली

ॐ श्री साँई राम जी
 
 

साखी ब्रह्मा और सरस्वती की

ॐ श्री साँई राम जी




साखी ब्रह्मा और सरस्वती की


चारे वेद वखाणदा चतुर मुखी होई खरा सिआणा |
लोका नो समझाइदा वेख सुरसवती रूप लुभाना |

भाई गुरदास जी के कथन अनुसार चार वेदों को उच्चारने वाला (ब्रह्मा) बहुत सूझवान था, लोगों को उपदेश देता था, पर अपनी पुत्री की जवानी और सुन्दरता को देख कर मोहित हो गया था| जिस कारण उसे दुख उठाना पड़ा था|

सरस्वती ब्रह्मा की पुत्री थी| वह बहुत ही सुन्दर और जवान थी| एक दिन सुबह सरस्वती नदी से स्नान करके आई| सूर्य की सुनहरी किरणों ने उसके कुंआरे गुलाबी चेहरे को और चमकाया हुआ था| अचानक ब्रह्मा जी खड़े-खड़े उसकी ही तरफ देखने लग गए, उनका दिल बदल गया| उनके मन की इस दशा को जान कर सूझवान सरस्वती ने अपना मुख दूसरी तरफ कर लिया| ब्रह्मा भी उस तरफ देखने लग गए| इस तरह सरस्वती चारों तरफ घूमी| ब्रह्मा के चार मुंह हो गए| सरस्वती ऊपर उड़ गई तो ब्रह्मा ने योग बल से तालू में आंखें लगा लीं| वह किसी कीमत पर भी सरस्वती को आंखों से ओझल नहीं होने देना चाहता था| यह देख कर भगवान शिव जी बहुत दुखी हुए, उन्होंने आगे बढ़ कर ब्रह्मा का पांचवा सिर (जो तालू के साथ था) धड़ से उतार कर फैंक दिया तथा ब्रह्मा को पुत्री भोग के पाप से बचा लिया|


कर्ण की कथा-कर्ण वास्तव में पांच पांडवों की माता कुंती का ही पुत्र था| पर माया के चक्र और कुंती की तपस्या के कारण पांडवों को इसका ज्ञान न था, क्योंकि जब कर्ण का जन्म हुआ था तब कुंती अभी कुंआरी थी| कर्ण के जन्म की कथा इस प्रकार बताई जाती है- कुंती जब माता-पिता के घर थी तो इसने दूरबाशा ऋषि की खूब सेवा की| ऋषि ने इसको कुछ मंत्र (अहवान) बताए और कहा कि कोई मंत्र पढ़ कर जिस चीज की इच्छा की पूर्ति की कामना करोगी, वह पूर्ण होगी| एक दिन कुंती सूर्य देवता के दर्शन करने के लिए ऊपर राजमहल की छत पर गई| सूर्य की सुनहरी किरणों और उसके बल प्रताप को देख कर उसके मन में आया कि सूर्य देवता यदि मेरे पास मानव रूप में आएं तो देखूं वह कितने बलवान और सुन्दर हैं| यह विचार कर उसने दुरबाशा ऋषि के बताए हुए मंत्रों में से एक मंत्र को पढ़ा| सूर्य एक सुन्दर युवक के रूप में कुंती के पास आ खड़ा हुआ| यह देख कर कुंती सहम गई| भयभीत होकर प्रार्थना की कि सूर्य देवता आप वापिस चले जाएं| पर सूर्य वापिस न गया| उसने कुंती के साथ भोग किया| कुंती कुंआरी ही गर्भवती हो गई, पर दूसरे मंत्र पढ़ने के योग से उसका गर्भ प्रगट न हुआ| जब बालक ने जन्म लिया तो उस बालक को कुंती ने नदी में बहा दिया| बहता हुआ बालक कौरवों के रथवान के हाथ आ गया| उसने बालक का पालन-पोषण करके जवान किया, जो कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ| महाभारत में इसने कौरवों का साथ दिया| अन्त में अपने भाई अर्जुन के हाथों वीरगति प्राप्त की| तब कुंती ने पांडवों को बताया कि कर्ण तुम्हारा भाई है|



समुद्र खारा होना 

यह आम सवाल है की जिस समुद्र में से अमृत, कामधेनु, लक्ष्मी, कल्प वृक्ष, धन्वंतरी वैद्य आदि कई तरह के बहुमूल्य पदार्थ निकले वह क्षार क्यों है? कहते हैं की अगस्त मुनि के क्रोधित हो कर एक बार सारे सागर के पानी को ढाई चुल्लियों में पी लिया था| जब जल पी लिया गया तो जितने जल-जीव थे, वह तड़पने और पुकारने लगे कि क्या हो गया? वह किसके सहारे जीवित रहेंगे? प्रभु ने तब अगस्त को प्रेरणा की कि पेट में कैद किए सागर को पहले की तरह स्वतन्त्र कर दो| भगवान के कहने पर अगस्त ने पेशाब किया, इसी कारण सागर का जल क्षार है|

कैसी दैत्य :- केसी कंस मथनु जिनी कीआ ||

कैसी दैत्य राजा कंस के वश में था| पापी कंस ने जहां श्री कृष्ण जी को मारने के अनेकों उपाय किए, वहीं कैसी दैत्य को भी घोड़ाबना कर गोकुल भेजा| पर श्री कृष्ण ने अपने योग बल द्वारा कैसी दैत्य को मार दिया| यहां भक्त नामदेव जी ईशारा करते हैं कि श्री कृष्ण जी हरि रूप थे जिन्होंने कैसी तथा कंस को (मक्खन) रिड़क-रिड़क अथवा कोह-कोह कर मारा था|

काली सर्प :- गोकुल के नजदीक ही यमुना में एक गहरा कुण्ड था| उस कुण्ड में एक सौ फन वाला सर्प रहता था| उसको 'काली'नाग भी कहा जाता था| गरुड़ भगवान से डरता हुआ वह उस कुण्ड में आ छिपा था, वह बहुत ज़हरीला था| जब वह फुंकारा मारता या सांस लेता था तो कुण्ड का पानी उबले लग पड़ता था| इसी कारण उस कुण्ड का नाम 'काली कुण्ड' पड़ गया था| उसका जल दूषित हो गया था| श्री कृष्ण ने एक दिन गेंद लेने के बहाने काली कुण्ड में छलांग लगा दी| श्री कृष्ण की नाग से लड़ाई हुई| उसके सौ फनो को श्री कृष्ण ने पैरों से कुचल दिया| काली सांप बेहोश हो कर हार गया| श्री कृष्ण ने उसको कहा, "यमुना कुण्ड छोड़ कर कहीं अन्य जगह चले जाओ|" काली सांप कुण्ड को छोड़ कर चला गया|

दुरबाशा ऋषि :- दुरबाशा ऋषि अत्तरे मुनि के पुत्र थे| इनको शिव का अवतार माना जाता है| जब युवा हुए तो औरव मुनि की सपुत्री कंदली से दुरबाशा का विवाह हो गया| इनमें तमो गुण विद्यमान थे| इस कारण बहुत क्रोधवान थे| इन्होंने अनेकों को वर और हजारों को श्राप दिए| शकुंतला को इन्होंने ही श्राप दिया था कि दुष्यंत तुम्हें भूल जाए| द्रौपदी को वर दिया था कि तुम्हारे पर्दे ढके रहें| अन्य भी कथा-कहानियां हैं|

दुरबाशा ने जब विवाह किया था तो प्रतिज्ञा की थी कि अपनी पत्नी की सौ भूलें बक्श देंगे| जब सौ से ऊपर भूल हुई तो क्रोधित होकर कंदली को भस्म कर दिया| औरव मुनि ने श्राप दे दिया| एक बार पिंडारक तीर्थ पर ताप करने के लिए गए तो वहां यादव बालक खेलने आया करते थे| वह बहुत मजाकीये थे| उन्होंने एक दिन दुरबाशा का मजाक किया| वह मजाक इस तरह था कि जमवंती के पुत्र सांब के पेट पर लोहे की बाटी बांध दी| स्त्रियों जैसे वस्त्र पहना कर घूंघट निकलवाया तथा दुरबाशा के पास ले गए और पूछने लगे, 'हे ऋषि जी! बताओ लड़की होगी या लड़का?

दुरबाशा समझ गया कि यह मेरे साथ मजाक कर रहे हैं, उसने सहज स्वभाव ही उत्तर दिया -'लोहे का मूसल पैदा होगा जो यादवों की कुल नाश करेगा|' यादवों को श्राप दे दिया, उस ओर ईशारा है :-

दुरबाशा के श्राप से "यादव इह फल पाए||"इस तरह दुरबाशा के श्राप से यादवों की कुल नष्ट हो गई थी|


अठारह पुराण 

गुरुबाणी तथा गुरमति साहित्य में 'आठ दस' या अठारह पुराणों का नाम बहुत बार आता है| जिज्ञासुओं के ज्ञान के लिए अठारह पुराणों की सूची आगे दी जाती है :-

१. ब्रह्मा पुराण | २. विष्णु पुराण | ३. वायु पुराण | ४. लिंग पुराण | ५. पदम पुराण | ६. सकंध पुराण | ७. बावन पुराण | ८. मस्ताना | ९. वराह पुराण | १०. अग्नि पुराण | ११. भूरम पुराण | १२. गरुड़ पुराण | १३. नारदीय | १४. भविष्यत पुराण | १५. ब्राह्मण वेवरत पुराण | १६. मारकंडे पुराण | १७. ब्रह्मांड पुराण | १८. श्रीमद् भागवत पुराण |

सहसबाहु-सहसबाहु का वास्तविक नाम कांहत विर्यारजन था| यह कृतवीर्य का पुत्र था| इसकी हजार भुजाएं थीं| इसलिए सहसबाहु कहा जाता था| गुरु नानक जी फरमाते हैं :-

सहस बाहु मधु कीट महिखासा ||
हरणाखसु ले नखहु बिधासा ||
दैत संघारे बिनु भगति अभिआसा ||

सहसबाहु का राज नर्मदा नदी के दोनों तरफ था| एक दिन कहते हैं कि सहसबाहु नदी में स्नान कर रहा था कि हजार भुजाएं फैला कर इस नदी के जल को रोक लिया| जल इकट्ठा होकर ऊंचा होने लगा| पानी ऊंचा होकर नदी किनारे खेतों तथा जंगलों में फैलने लगा| एक वन में रावण भक्ति कर रहा था, पानी उसके नीचे चला गया| सहसबाहु ने उसको जकड़ कर बंदी बना लिया| इसी सहसबाहु ने जमदग्नि को मारा था|


रक्त बीज 

रक्त बीज एक ऐसा दैत्य था कि इसके रक्त की जितनी बूंदें धरती पर गिरती उतने ही दैत्य उत्पन्न हो जाते थे| कहते हैं कि राजा निसुंभ की लड़ाई देवी माता दुर्गा से हुई तो रक्त बीज उस से सुंभ निसुंभ की तरफ सेनापति था| काली मां ने इसके रक्त को पीकर इसका संहार किया था|


मधु कीटब

यह दो दैत्य थे| भगवान विष्णु ने इनको अपने कानों की मैल से उत्पन्न किया था| युवा होकर दोनों दैत्य ब्रह्मा जी को खाने लगे| ब्रह्मा जी ने अपने प्राण बचाने के लिए भगवान विष्णु की उस्तति की और उन्हें सोते हुए जगाया| भगवान विष्णु कई हजार वर्षों से सोए हुए थे| ब्रह्मा जी के ध्यान करने पर वह अपनी निद्रा से जाग उठे| दैत्य मधु और कीटब से भगवान विष्णु का पांच हजार वर्ष घोर युद्ध होता रहा लेकिन इस युद्ध में न ही विष्णु जी हारे और न ही मधु कीटब ने दम छोड़ा| अंत में महा माया ने हस्तक्षेप किया| मोहिनी रूप होकर उसने मधु और कीटब को भ्रम में डाल दिया| दोनों दैत्य शांत हो गए| उन्होंने भगवान विष्णु से लड़ना छोड़ दिया| दोनों राक्षसों ने विष्णु से कहा, 'आप हमारे साथ बहादुरी से लड़ते रहे हो, इसलिए जो चाहे वार मांग लीजिए|'

"मुझे अपने सिर दे दें|" यह मांग भगवान विष्णु ने मधु और कीटब राक्षसों से की| वचन के अनुसार दैत्यों को अपने सिर भगवान विष्णु को अर्पण करने पड़े| भगवान विष्णु ने अपनी जांघ पर दोनों दैत्यों के सिर धड़ से जुदा कर दिए| दैत्यों के सिर काटने पर उनका जो रक्त उससे निकला, वह समुद्र के पानी में जम कर धरती बन गई| यह धरती की भी जन्म कथा है|


Saturday, 2 November 2013

साखी गरुड़ की

ॐ श्री साँई राम जी


साखी गरुड़ की


पुरातन काल में एक ऋषि कश्यप हुए हैं, वह गृहस्थी थे तथा उनकी दो पत्नियां थीं - बिनता और कदरू| कदरू के गर्भ में से सांप पैदा होते थे जिनकी कोई संख्या नहीं थी, पर बिनता के कोई पुत्र पैदा नहीं होता था| वह बहुत दुखी थी| उसने अपने पति के आगे अपना दुःख प्रगट किया| कश्यप ने कहा-तुम्हारे पुत्र तभी हो सकता है, यदि यज्ञ किया जाए| बिनता ने कहा-तुम्हारे पुत्र तभी हो सकता है, यदि यज्ञ किया जाए| बिनता ने कहा-फिर यज्ञ करो| यज्ञ का प्रबन्ध किया गया| देवराज इन्द्र जैसे देवता यज्ञ में आए| उस यज्ञ के साल बाद बिनता के गर्भ से दो पुत्र पैदा हुए जो अग्नि तथा सूर्य के समान बहुत तेज़ वाले थे| एक का नाम गरुड़ तथा दूसरे का अरूण रखा गया| जब दोनों बड़े हुए तो गरुड़ को विष्णु जी ने अपना यान बना लिया, उस पर सवारी करने लगे| गरुड़ सब पक्षियों से तेज़ दौड़ता था| अरूण सूर्य का रथवान बन बैठा क्योंकि वह बहुत महाबली था, सूर्य उस पर प्रसन्न रहता था|

अरूण तथा गरुड़ के बाद बिनता के चार पुत्र पैदा हुए| जिनके नाम यह हैं - ताख्रया, अरिष्ट नेमि, आरूनि तथा वारूण| ये छ: पुत्र बड़े सूझवान तथा बली थे, पर सांपों से इनको सदा खतरा रहता था| कदरू चाहती भी थी कि बिनता के पुत्र मार दिए जाएं, पर उसको कोई बहाना तथा समय हाथ नहीं आता था| महाभारत में कथा आती है कि बिनता तथा कदरू एक दिन किसी बात पर आपस में वाद-विवाद करने लग पड़ी कि सूर्य का घोड़ा काला है या सफेद| कदरू कहती थी काला तथा बिनता रहती थी सफेद| चालाकी से कदरू ने सफेद घोड़े को काला साबित करके बिनता को दिखा दिया| शर्त के अनुसार बिनता पुत्रों सहित सौतन की गुलाम हो कर रहने लगी| पराधीन मनुष्य तो स्वप्न में भी सुखी नहीं होता, फिर सौतन की पराधीनता तो वैसे ही बुरी होती है| बिनता बहुत दु:खी हुई| बिनता ने कदरू से पूछा कि क्या कोई मार्ग है जिससे मैं स्वतन्त्र हो सकती हूं? कदरू ने उत्तर दिया - 'यदि स्वर्ग (इन्द्र लोक) में से अमृत का घड़ा मंगवा कर मुझे दे दो तो तुम तथा तुम्हारे पुत्र भी स्वतन्त्र हो जाएंगे, क्योंकि मैं अमृत अपने पुत्र सांपों को पिला दूंगी, वह अमर हो जाएंगे, उनको कोई नहीं मार सकेगा|'

सौतन की इस मांग को बिनता ने अपने पुत्र गरूड़ के आगे प्रगट किया| बलशाली गरूड़ बोले-'हे माता! तुम्हारे सुखों के लिए मैं जान कुर्बान करने के लिए तैयार हूं| आज ही इन्द्र लोक पहुंचता हूं तथा अमृत का घड़ा लेकर आता हूं| यह कौन-सी कठिन बात है|' माता को इस तरह धैर्य देकर गरूड़ इन्द्रलोक चला गया| अमृत के घड़े को देवता भला कैसे उठाने देते| गरूड़ तथा इन्द्र की लड़ाई हो गई| कई दिन महा भयानक युद्ध लड़ते रहे| अंत में इन्द्र हार गया तथा गरूड़ जीत गया| गरूड़ की बहादुरी को देख कर इन्द्र उस पर प्रसन्न हो गया, खुशी में कहने लगा - 'कोई वर मांगना हो तो मांग लो|' उस समय गरूड़ ने यह वर मांगा, 'एक तो मैं प्रभु विष्णु जी की सेवा करता रहूं तथा दूसरा सांप मेरी खुराक हो जाएं|' गरूड़ की यह मांगें सुन कर इन्द्र ने यहीं वर दिए| वर देने के पश्चात पूछा, 'एक तरफ तुम सांपों को अमृत दे कर अमर कर रहे हो, दूसरी तरफ कहते हो वह मेरी खुराक बन जाएं, यह क्या मामला है?' गरूड़ बोला - 'मैंने अमृत दे कर माता के वचन की पालना करनी है तथा उनको उनकी सौतन से स्वतन्त्र करवाना है| जब मेरा धर्म पूरा हो जायेगा बेशक आप घड़ा वापिस मंगवा लेना| मैंने इसका क्या करना है| हां ऐसे करो! दूत मेरे साथ भेजो! जब मेरी माता यह अमृत का घड़ा मेरी सौतेली माता कदरू के हवाले करे तो उस समय वह जहां उस घड़े को रखे वहां से आपके दूत उस घड़े को उठा कर भाग आएं|'

गरूड़ की इस योजना को देवराज इन्द्र मान गया| इन्द्र ने उसी समय अपने चार दूत गरूड़ के पीछे मृत्यु लोक में भेज दिए| गरूड़ अमृत का घड़ा लेकर घर पहुंचा| अपनी मां को सौंपकर खुशियां प्राप्त कीं| बिनता ने वही घड़ा जा कर कदरू को सौंप दिया तथा कदरू ने घड़ा एक स्थान पर रखकर बिनता को स्वतन्त्र कर दिया| उधर सांपों के अमृत घड़े के पास पहुंचने से पहले ही इन्द्र के दूत घड़ा उठा कर रफ्फू चक्कर हो गए| कदरू के कहने पर सांप अमृत पीने गए| उनको घड़ा न मिला, पर जिस जगह घड़ा रखा हुआ था, उसी जगह को जीभों से चाटने लग गए| उनकी जीभें छिल गईं| उस दिन से सांपों की नस्ली तौर पर जीभ छिलनी शुरू हो गई|

रामायण में लिखा है कि जब श्री रामचन्द्र जी मेघनाद से युद्ध कर रहे थे तो मेघनाद ने दैवी शक्ति के बल से श्री रामचन्द्र जी को सेना सहित नागों के फन से धरती पर गिरा लिया| उस समय देवर्षि नारद तथा भगवान विष्णु ने गरूड़ को भेजा| गरूड़ ने जाकर सारे नाग खा लिए तथा श्री रामचन्द्र जी को सेना सहित मरने से बचा लिया|

हिन्दू लोग गरूड़ को भगवान का रूप भी मानते हैं| यह पक्षियों का राजा तथा विष्णु का सेवादार है| इसके दर्शन करने बहुत शुभ हैं|

Friday, 1 November 2013

सत्ता और बलवंड

ॐ श्री साँई राम जी




सत्ता और बलवंड

सत्ता और बलवंड दोनों सगे भाई थे| वह भाट जाति से थे और पांचवें पातशाह श्री गुरु अर्जुन देव जी के समय उनकी हजूरी में कीर्तन किया करते थे| रागों में निपुण होने के कारण वह अच्छे रबाबी बन गए| उनकी चारों तरफ कीर्ति थी और गुरु घर में उनको अच्छा मान-सम्मान प्राप्त था| उनका कीर्तन सुनकर सारी संगत का समां बंध जाता था| सत्ता की लड़की जवान हुई तो उसका विवाह करने का निर्णय किया गया| गुरु घर के रबाबी होने के कारण उन्होंने सलाह की कि लड़की का विवाह बड़ी धूमधाम के साथ किया जाएगा लेकिन सत्ता और बलवंड के पास इतना धन नहीं था कि जो अच्छा दहेज दे सकें और आए मेहमानों एवं बारातियों को अच्छा से अच्छा भोजन खिला सकें| सत्ता ने अपने भाई बलवंड से सलाह करके मन में सोचा कि वह सतिगुरु जी के आगे प्रार्थना करेंगे कि सतिगुरु जी एक दिन की सारी भेंट उन्हें देने की कृपा करें, वह भेंट अधिक होगी तथा उनके सारे कार्य संवर जाएंगे|

यह सोचकर दोनों भाई सतिगुरु जी के पास गए और विनती की, 'महाराज! हमारी लड़की का विवाह है लेकिन विवाह का खर्च पूरा करने के लिए हमारे पास कुछ नहीं, इसलिए आप जी कृपा करके आज की सारी भेंट हमें देकर मेहर करें|'

रबाबियों की यह बात सुनकर सतिगुरु जी मुस्करा दिए और वचन किया, 'राय कन्या की शादी की चिन्ता न करो| गुरु घर में कीर्तनीए होने के कारण आपको कोई कमी नहीं आएगी| आवश्यकता अनुसार आपको धन मिल जाएगा|

लेकिन सत्ता और बलवंड सतिगुरु जी के वचनों का भावार्थ न समझ सके, उनके मन में लालच आ गया था| सतिगुरु जी उनके मन की बदली हुई दशा को जान गए थे| इसलिए गुरु जी अहंकार की अग्नि से उन दोनों को बचाना चाहते थे| लेकिन रबाबी अहंकार से न बच सके और उन्होंने अपनी जिद्द न छोड़ी| अन्त में सतिगुरु जी ने वचन किया, 'ठीक है, जो भेंट कल संगत चढ़ाएगी आप ले जाना और उससे अपनी पुत्री की शादी कर लेना|'

प्रात:काल सत्ता और बलवंड ने कीर्तन करना शुरू किया लेकिन उनकी वृति कीर्तन की तरफ से उखड़कर भेंट की ओर लग गई| कीर्तन के समय जो भी सिक्ख या गुरु घर का श्रद्धालु आकार नमस्कार करता तो दोनों भाइयों की निगाह उसके चढ़ावे की तरफ लग जाती| इस तरह कीर्तन में रस न रहा, ताल की एकसुरता टूट गई और लै कांपने लगी| गुरुबाणी में भी कई भूलें होने लगीं तथा बेरसी छा गई|

उनके कीर्तन की बेरसी और संगत के कम आने के कारण ऐसा सबब बना कि एक सौ रूपए से अधिक चढ़ावा भेंट न हुआ| भेंट कम देखकर दोनों भाइयों के सिर में पानी फिर गया|

वह कुछ गुस्से और हैरानी के साथ बोले, 'महाराज! संगत की ओर से भेंटे बहुत कम चढ़ाई गई हैं, इसलिए हमारी और सहायता कीजिए, इतने से शादी नहीं हो सकती|

यह सुनकर पांचवें पातशाह मुस्कराए और वचन किया, 'भाई आप ने चढ़ावे का फैसला किया था| इसलिए चढ़ावा ले जाओ| कन्या की किस्मत में जो कुछ होगा, वह उसको मिल जाएगा| लड़की की चिन्ता न करो पर अपना वचन निभाओ|'

उस समय दोनों भाइयों की बुद्धि भ्रष्ट हो गई तथा उनको किसी बात की समझ ही नहीं आई| मन में अहंकार था कि वह कीर्तनीए हैं, यदि कीर्तन न करेंगे तो गुरु का दरबार कैसे लगेगा? सतिगुरु महाराज जी की शक्ति का अनुभव भी भूल गया और अहंकार करके बैठने का फैसला कर लिया|

अगली सुबह 'आसा की वार' का कीर्तन होना था लेकिन दोनों ही रबाबी हाजिर न हुए और घर में पलंग पर लेटे रहे| दरबार में संगत इंतजार करने लगी| सतिगुरु जी भी अपने नियम अनुसार दरबार में उपस्थित हुए और सिंघासन पर विराजमान हो गए| गुरु जी ने रबाबियों को दरबार में अनुपस्थित देखकर एक सिक्ख को कहा कि वह उन दोनों को बुला कर लाए| श्रद्धालु सिक्ख दौड़ कर गया| उसने दोनों भाइयों सत्ता और बलवंड को जाकर कहा, 'श्रीमान जी! सच्चे पातशाह आपको याद कर रहे हैं, आप चलकर कीर्तन करो|'

यह सुनकर सत्ते के तनबदन में आग लग गई और पागलों की तरह गुस्से से बोला, 'हमने कोई कीर्तन नहीं करने जाना| यदि हमने चढ़ावे के लिए कहा तो मसंदों द्वारा चढ़ावा रोक दिया गया| हमारे साथभेदभाव किया गया है| इसलिए आज से हम गुरु घर में कीर्तन नहीं करेंगे|

किसी और सोढी या बेदी के आगे कीर्तन करके उसको गुरु बना सकते हैं| गुरु बनाना या न बनाना हमारे वश में है| यह उत्तर सुनकर सिक्ख वापिस लौट आया और उसने सारी बात सतिगुरु महाराज जी के आगे व्यक्त कर दी|

दया एवं विनय के सागर सच्चे पातशाह नाराज न हुए अपितु भाई गुरदास जी को यह कह कर भेजा कि वह रागियों को सत्कार सहित दरबार में ले आएं| उनकी कन्या का विवाह उसी तरह धूमधाम से हो जाएगा, जैसा वह चाहते हैं|

भाई गुरदास जी सत्ता और बलवंड के घर पहुंचे| उन्होंने बड़ी नम्रता से दोनों को समझाने का प्रयास किया लेकिन रबाबियों का गुस्सा शांत न हुआ| भाई बलवंड ने बड़े गुस्से और मूर्खता के साथ यह जवाब दिया, 'जाओ आप कीर्तन कर लो| गुरु यदि इतनी शक्ति रखते हैं तो वह आप ही कीर्तन करें| हम आगे से गुरु दरबार में कीर्तन नहीं करेंगे|' भाई गुरदास जी ने फिर भी इसका गुस्सा न किया अपितु सत्ता और बलवंड को समझा कर उनके मन को शांत करने का अथक प्रयास किया लेकिन वे टस से मस न हुए| दोनों भाई हठ करके बैठे रहे मगर गुरु दरबार में उपस्थित न हुए|

पांचवें पातशाह श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज स्वयं सिंघासन से उठकर रबाबियों के घर पहुंचे| संगत भी गुरु जी के साथ जाना चाहती थी लेकिन सतिगुरु जी ने भाई गुरदास जी के अलावा किसी अन्य को साथ न लिया| दीन दुनिया के वाली सत्ता और बलवंड के घर पधारे तो सबब से दरवाजा खुला हुआ था| गुरु साहिब आंगन में चले गए| आगे दोनों भाई चारपाई पर बैठे थे| उन्होंने इतना जिद्दीपन अपनाया कि न उठकर श्री सतिगुरु अर्जुन देव जी को नमस्कार की और न ही उनका स्वागत किया| अपितु आंखें झुकाकर बैठे रहे| सतिगुरु जी ने नम्रता से वचन किया| अपितु आंखें झुकाकर बैठे रहे| सतिगुरु जी ने नम्रता से वचन किया, 'चलो, भाई! गुरु घर में कीर्तन करो और सतिगुरु नानक देव जी की खुशियां प्राप्त करो| गुरु घर के साथ नाराज तोना ठीक नहीं, गुरुबाणी संगत को सुनानी है| आपकी कन्या की शादी के लिए आपको पर्याप्त धन मिल जाएगा|'

राय बलवंड बड़ा गुस्सैल स्वभाव वाला साबित हुआ| उसने आगे से बड़े अहंकार के साथ कहा, 'हमने नहीं कीर्तन करने जाना| हमने आपको गुरु बनाने का प्रयास किया लेकिन आपने हमारे साथ छल करके भेंटें न चढ़ने दीं, जिससे दिल चाहे कीर्तन करवा लें| हम किसी अन्य सोढी के पास चले जाएंगे| श्री गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु रामदास जी तक हम ही गुरु बनाते आए हैं, यदि हम कीर्तन न करते तो आपको किसने गुरु मानना था?'

श्री गुरु अर्जुन देव जी ने जब ऐसे कटु वचन सुने तो बड़े सतिगुरुों की निंदा सुनी, तब वह सहन न कर सके और क्रोध में आकर वचन किया - 'सत्ता और बलवंड आप कुष्ठी हो गए हो, यह कुष्ठ आपको तंग करेगा|' यह वचन करके गुरु जी अपने दरबार में आ गए|

दरबार में आकर गुरु जी ने अपनी आत्मिक शक्ति का एक महान चमत्कार दिखाया| वह चमत्कार इस प्रकार था कि उन्होंने दरबार में हुक्म कर दिया कि आज से गुरु घर के सिक्ख आप कीर्तन किया करेंगे| साज बजाएंगे और ऐसे अहंकारी गायकों की कभी आवश्यकता नहीं रहेगी| यह वचन करके सतिगुरु जी ने दो सिक्खों को इशारा किया कि वह साज पकड़कर कीर्तन करें| सिक्खों ने साज लेकर राग गाया| ऐसा चमत्कार हुआ कि गंधर्व रागियों की तरह कीर्तन का रस बंध गया तथा सचमुच ही रबाबियों की आवश्यकता न रही|


सत्ता और बलवंड को कुष्ठ रोग होना 

सतिगुरु जी के वापिस आने के पश्चात सत्ता और बलवंड को सचमुच ही कुष्ठ रोग हो गया| वह जिधर को निकलते, लोग उनके दर्शन न करते और अपना द्वार बंद कर लेते, क्योंकि वह सतिगुरु जी के फिटकारे हुए थे| धीरे-धीरे रोग बढ़ गया| एकत्रित किया हुआ धन समाप्त हो गया और गुरु निंदकों को किसी सोढी या बेदी ने मुंह न लगाया| दिन-ब-दिन उनकी दशा खराब हो गई तथा वह दुःख पाने लगे|

दुखी हुए दोनों भाई चाहते थे कि सतिगुरु जी उन दोनों की भूल क्षमा कर दें लेकिन वह सतिगुरु जी के हजूर में किसी तरह भी नहीं जा सकते थे| गुरु जी ने हुक्म किया था कि जो भी कोई इन दोनों की फरियाद करेगा, उनका मुंह काला कर दिया जाएगा| जिस कारण कोई भी सिक्ख डरता हुआ सतिगुरु के समक्ष विनती न करता| सभी डरते थे कि सतिगुरु जी शायद उनको भी श्राप न दे दें|

दोनों भाई अपनी छत पर खड़े होकर अपने मुख पर आप तमाचे मारते थे और की हुई भूल पर रो-रोकर पछतावा करते| वह चिल्ला कर कहते, 'कोई हमारा दुःख सुने तथा गुरु जी के पास ले चले, हम पापी और महाकुष्ठी हैं| हमारी फरियाद सुनी जाए|' लेकिन कोई भी हां न करता जो उनकी फरियाद सुनता|

राय बलवंड को याद आया कि लाहौर में भाई लधा परोपकारी हैं| दुःख-तकलीफ उठाते हुए पैदल चलकर दोनों भाई लाहौर पहुंचे| भाई लधा जी के पास जाकर उन्होंने विलाप करके कहा, 'भाई लधा जी आप परोपकारी महापुरुष हो, यह तो आप ने सुन ही लिया है कि हमने सतिगुरु अर्जुन देव जी पातशाह के हजूर निंदा भरे वचन बोले हैं| अहंकार और लालच ने बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी| हम अन्धे और बहरे हो गए थे| सतिगुरु के वचन अनुसार हमें कुष्ठ रोग हो गया है| हम अत्यंत दु:खी हैं| कृपा करें और सतिगुरु जी से भूल क्षमा करवा दें|'

इस तरह विनती करते हुए वह रोते तथा पीटते गए| तब भाई लधा परोपकारी के मन में दया आ गई| उन्होंने वचन किया, अब आप जाएं, मैं कल सतिगुरु जी के दरबार में स्वयं हाजिर होकर प्रार्थना करूंगा और आपके लिए क्षमा की भीख मांगूंगा| आशा है कि सतिगुरु जी मेहर के घर में आएंगे|

सत्ता और बलवंड भाई लधा जी से कुछ आशा भरे वचन सुनकर उसका यश करते हुए अपने घर लौट आए|

भाई लधा जी लाहौर में सतिगुरु जी के श्रद्धालु सिक्ख थे| आप बड़े परोपकारी तथा दया धर्म और नाम के रसिया थे| जिस कारण हर कोई दुखिया उनके पास जाता और विनती करता था| उनको जब पता लगा कि सत्ता और बलवंड की जो सिफारिश करेगा उसको बदनाम होना पड़ेगा| उसकी हर तरफ बदनामी होगी, क्योंकि सतिगुरु का हुक्म है कि जो कोई सत्ता तथा बलवंड की सिफारिश करेगा उसका मुंह काला करके गधे पर बैठा कर घुमाया जाएगा| परोपकारी भाई लधा जी ने आप ही नशर होने का उपाय बना लिया| भाई लधा ने एक गधा मंगवा कर उसको चिथड़ों की लगाम डाली और फटी हुई गोदड़ी डालकर उसके ऊपर आप बैठ गए| भाई लधा ने अपने मुंह और बदन पर कालिख पोत ली और लोगों के लिए निकम्मा बन गए| वह लाहौर से अमृतसर की तरफ चल पड़े| भाई लधा जी एक महान परोपकारी गुरसिक्ख थे और अपनी हानि करके भी दूसरों का सदा भला करते थे| धीरे-धीरे चलते हुए वह अमृतसर पहुंच गए| सतिगुरु जी को पहले ही पता चल गया था| इसलिए सतिगुरु जी स्वयं आगे होकर मिले तथा हंसकर वचन किया -

'...भाई लधा जी! यह कैसा सांग बनाया हुआ है ?'

'महाराज! जिस तरह आपकी आज्ञा!' भाई लधा जी ने उत्तर दिया|

'महाराज! सत्ता और बलवंड कुष्ठ रोगी हो गए हैं तथा कुरला रहे हैं| दया कीजिए, आपका यश करेंगे, भूल अनुभव करते हैं, इन्हें क्षमा कर दें| बच्चे सदा भूलें करते रहते हैं और माता-पिता क्षमा करते रहते हैं| मेहर करें| फिर भी गुरु घर के कीर्तनीए हैं|' इस तरह भाई लधा जी ने विनती की|

सतिगुरु जी ने भाई लधा जी को गधे से नीचे उतारा और हाथ-मुंह धुलाया तथा वार दिया, 'भाई लधा परोपकारी|' यह भी वचन कर दिया, 'अच्छा! जिस तरह इन्होंने सतिगुरु महाराज (गुरु नानक देव जी तथा बाकी के गुरु साहिबों की| निंदा की थी, तैसे ही यश करें, वह जैसे-जैसे यश करते जाएंगे, वैसे ही उनका कुष्ठ रोग दूर होता जाएगा|

सतिगुरु जी का यह हुक्म सत्ता और बलवंड को सुनाया गया| उन्होंने गुरु साहिब से अपनी भूल की क्षमा मांगी व फिर से दरबार में कीर्तन करने लगे| इनके द्वारा किया गया गुरु यश बाणी के रुप में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज है| आओ दर्शन करें -
रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सत्तै डूमि आखी

१ओ सतिगुरु प्रसादि||
नाउ करता कादरु करे किउ बोलु होवै जोखीवदै ||
दे गुना सति भैण भराव है पारंगति दानु पड़ीवदै ||
नानकि राजु चलाइआ सचु कोटु सताणी नीव दै ||
लहणे धरिओनु छतु सिरि करि सिफती अंम्रितु पीवदै ||
मति गुर आतम देव दी खड़गि जोरि पराकुइ जीअ दै ||
गुरि चेले रहरासि कीई नानकि सलामति थीवदै ||
साहि टिका दितोसु जीवदै ||१||
लहणे दी फेराईऐ नानका दोही खटिऐ ||
जोति ओहा जुगति साइ सहि काइआ फेरि पलटिए ||
झुलै सु छतु निरंजनी मलि तखतु बैठा गुर हटिऐ ||
करहि जि गुर फुरमाइआ सिल जोगु अलूणी चटीऐ ||
लंगरु चलै गुर सबदि हरि तोटि न आवी खटिऐ ||
खरचे दिति खसंम दी आप खहदी खैरि दबटीऐ ||
होवै सिफति खसंम दी नूरु अरसहु झटीऐ ||
तुधु डिठे सचे पातिसाह मलु जनम जनम दी कटीऐ ||
सचु जि गुरि फुरमाइआ किऊ एदू बोलहु हटिऐ ||
पुत्री कउलु न पालिओ करि पीरहु कंन्हि मुरटीऐ ||
दिलि खोटै आकी फिरनि बंनि भारु ऊचाइन्हि छटीऐ ||
जिनि आखी सोई करे जिनि कीती तिनै थटीऐ ||
कउणु हारे किनि ऊवटीऐ ||२||
जिनि कीती सो मंनणा को सालु जिवाहे साली ||
धरम राई है देवता लै गला करे दलाली ||
सतिगुरु आखै सचा करे सो बात होवै दरहाली ||
गुर अंगद दी दोही फिरी सचु करतै बंधि बहाली ||
नानकु काइआ पलटु करि मलि तखतु बैठा सै डाली ||
दरु सेवे उमति खड़ी मसकलै होई जंगाली ||
दरि दरवेसु खसंम दै नाई सचै बाणी लाली ||
बलवंड खीवी देक जन जिसु बहुती छाउ पत्राली ||
लांगरि दउलति वंडीऐ रसु अंम्रितु खीरि घिआली ||
गुरसिखा के मुख उजले मनमुख थीए पराली ||
पए कबूलु खसंम नालि जां घाल मरदी घाली ||
माता खीवी सहु सोइ जिनि गोइ उठाली ||३||
होरिंओ गंग वहाईऐ दुनिआई आखै कि किओनु ||
नानक ईसरि जगनाथि उचहदी वैणु विरिकिओनु ||
माधाणा परबतु करि नेत्रि बासकु सबदि रिड़किओनु ||
चउदह रतन निकालिअनु करि आवा गउणु चिलाकिओनु ||
कुदरति अहि वेखालीअनु जिणि ऐवड पिड ठिणकिओनु ||
लहणे धरिओनु छत्रु सिरि असमानि किआड़ा छिकिओनु ||
जोति समाणी जोति माहि आपु आपै सेती मिकिओनु ||
सिखां पुत्रां घोखि कै सभ उमति वेखहु जिकिओनु ||
जां सुधोसु तां लहणा टिकिओनु ||४||
फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ||
जपु तपु संजमु नालि तुधु होरु मुचु गरूरु ||
लबु विणाहे माणसा जिउ पाणी बूरु ||
वारिऐ दरगह गुरु की कुदरती नूरु ||
जितु सु हाथ न लभई तूं ओहु ठरूरु ||
नउ निधि नामु निधानु है तुधु विचि भरपूरु ||
निंदा तेरी जो करे सो वंञै चूरु ||
नेड़ै दिसै मात लोक तुधु सुझै दूरु ||
फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ||५||
सो टिका सो बैहणा सोई दिबाणु ||
पियू दादे जेविहा पोता परवाणु ||
जिनि बासकु नेत्रै घतिआ करि नेहि ताणु ||
जिनि समुंदु विरोलिआ करि मेरु मधाणु ||
चउदह रतन निकालिअनु कीतोनु चानाणु ||
घोड़ा कीतो सहज दा जतु कीओ पलाणु ||
धणखु चड़ाइओ सत दा जस हंदा बाणु ||
कलि विचि धू अंधारु सा चड़िआ रै भाणु ||
सतहु खेतु जमाइओ सतहु छावाणु ||
नित रसोई तेरीऐ घिउ मैदा खाणु ||
चारे कुंडां सूझीओसु मन महि सबदु परवाणु ||
आवा गउणु निवारिओ करि नदरि नीसाणु ||
अउतरिआ अउतारु लै सो पुरखु सुजाणु ||
झखड़ि वाउ न डोलई परबतु मेराणु ||
जाणै बिरथा जीअ की जाणी हू जाणु ||
किआ सालाही सचे पातिसाह जां तू सुघड़ु सुजाणु ||
दानु जि सतिगुर भावसी सो सते दाणु ||
नानक हंदा छत्त्रु सिरि उमति हैराणु ||
सो टिका सो बैहणा सोई दीबाणु ||
पिऊ दादै जेविहा पोत्रा परवाणु ||६||
धंनु धंनु रामदास गुरु जिनि सिरिआ तिनै सवारिआ ||
पूरी होई करामाति आपि सिरजणहारै धारिआ ||
सिखी अतै संगती पारब्रहमु करि नमसकारिआ || 
अटलु अथाहु अतोलु तू तेरा अंतु न पारावारिआ ||
जिन्ही तूं सेविआ भाउ करि से तुधु पारि उतारिआ ||
लबु लोभु कामु क्रोधु मोहु मारि कढे तुधु सपरवारिआ ||
धंनु सु तेरा थानु है सचु तेरा पैसकारिआ ||
नानकु तू लहणा तूहै गुरु अमरु तू वीचारिआ ||
गुरु डिठा तां मनु साधारिआ ||७||
चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ||
आपीन्है आपु साजिओनु आपे ही थंम्हि खलोआ ||
आपे पटी कलम आपि आपि लिखणहारा होआ || 
सभ उमति आवण जावणी आपे ही नवा निरोआ ||
तखति बैठा अरजन गुरु सतिगुर का खिवै चंदोआ ||
उगवणहु तै आथवणहु चहु चकी कीअनु लोआ ||
जिन्ही गुरू न सेविओ मनमुखा पइआ मोआ ||
दूणी चउणी करामाति सचे का सचा ढोआ ||
चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ||८||१||



इस तरह जब सत्ता तथा बलवंड ने गुरु महाराज की उस्तति की तो उनका कुष्ठ रोग दूर हो गया| भोग डाला गया तथा अमृत सरोवर में स्नान किया तथा वे तरोताजा शुद्ध हो गए| वह पुन: गुरु दरबार में कीर्तन करने लग गए|

लेकिन सतिगुरु महाराज जी ने हुक्म दिया कि आगे से तमाम सिक्ख राग तथा साज विद्या की शिक्षा प्राप्त करें तथा गुरु घर में हर कोई श्रद्धालु कीर्तन कर सकता है| रबाबियों की अजारेदारी को समाप्त कर दिया गया| वह इसलिए कि कोई शिकायत देकर कीर्तन करने से आकी न हो| यदि रागी या रबाबी न भी मिले तो भी कीर्तन होता रहे|

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एक 18 साल का लड़का ट्रेन में खिड़की के पास वाली सीट पर बैठा था. अचानक वो ख़ुशी में जोर से चिल्लाया "पिताजी, वो देखो, पेड़ पीछे जा रहा हैं". उसके पिता ने स्नेह से उसके सर पर हाँथ फिराया. वो लड़का फिर चिल्लाया "पिताजी वो देखो, आसमान में बादल भी ट्रेन के साथ साथ चल रहे हैं". पिता की आँखों से आंसू निकल गए. पास बैठा आदमी ये सब देख रहा था. उसने कहा इतना बड़ा होने के बाद भी आपका लड़का बच्चो जैसी हरकते कर रहा हैं. आप इसको किसी अच्छे डॉक्टर से क्यों नहीं दिखाते?? पिता ने कहा की वो लोग डॉक्टर के पास से ही आ रहे हैं. मेरा बेटा जनम से अँधा था, आज ही उसको नयी आँखे मिली हैं. #नेत्रदान करे. किसी की जिंदगी में रौशनी भरे.