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शिर्डी से सीधा प्रसारण ,... "श्री साँई बाबा संस्थान, शिर्डी " ... के सौजन्य से... सीधे प्रसारण का समय ... प्रात: काल 4:00 बजे से रात्री 11:15 बजे तक ... सीधे प्रसारण का इस ब्लॉग पर प्रसारण केवल उन्ही साँई भक्तो को ध्यान में रख कर किया जा रहा है जो किसी कारणवश बाबा जी के दर्शन नहीं कर पाते है और वह भक्त उससे अछूता भी नहीं रहना चाहते,... हम इसे अपने ब्लॉग पर किसी व्यव्सायिक मकसद से प्रदर्शित नहीं कर रहे है। ...ॐ साँई राम जी...

Thursday, 10 November 2011

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 31

मुक्ति-दान
सन्यासी विजयानंद
बालाराम मानकर
नूलकर
मेघा और
बाबा के सम्मुख बाघ की मुक्ति
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इस अध्याय में हेमाडपंत बाबा के सामने कुछ भक्तों की मृत्यु तथा बाघ के प्राण-त्याग की कथा का वर्णन करते है ।

प्रारम्भ
मृत्यु के समय जो अंतिम इच्छा या भावना होती है, वही भवितव्यता का निर्माण करती है । श्री कृष्ण ने गीता (अध्याय-8) में कहा है कि जो अपने जीवन के अंतिम क्षण में मुझे स्मरण करता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है तथा उस समय वह जो कुछ भी दृश्य देखता है, उसी को अन्त में पाता है । यह कोई भी निश्चयात्मक रुप से नहीं कह सकता कि उस क्षण हम केवल उत्तम विचार ही कर सकेंगे । जहाँ तक अनुभव में आया है, ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय अनेक कारणों से भयभीत होने की संभावना अधिक होती है । इसके अनेक कारण है । इसलिये मन को इच्छानुसार किसी उत्तम विचार के चिंतन में ही लगाने के लिए नित्याभ्यास अत्यन्त आवश्यक है । इस कारण सभी संतों ने हरिस्मरण और जप को ही श्रेष्ठ बताया है, ताकि मृत्यु के समय हम किसी घरेलू उलझन में न पड़ जायें । अतः ऐसे अवसर पर भक्तगण पूर्णतः सन्तों के शरणागत हो जाते है, ताकि संत, जो कि सर्वज्ञ है, उचित पथप्रदर्शन कर हमारी यथेष्ठ सहायता करें । इसी प्रकार के कुछ उदाहरण नीचे दिये जाते है ।

1. विजयानन्द
एक मद्रासी सन्यासी विजयानंद मानसरोवर की यात्रा करने निकले । मार्ग में वे बाबा की कीर्ति सुनकर शिरडी आये, जहाँ उनकी भेंट हरिद्वार के सोमदेव जी स्वामी से हुई और इनसे उन्होंने मानसरोवर की यात्रा के सम्बन्ध में पूछताछ की । स्वामीजी ने उन्हें बताया कि गंगोत्री से मानसरोवर 500 मील उत्तर की ओर है तथा मार्ग में जो कष्ट होते है, उनका भी उल्लेख किया जैसे कि बर्फ की अधिकता, 50 कोस तक भाषा में भिन्नता तथा भूटानवासियों के संशयी स्वभाव, जो यात्रियों को अधिक कष्ट पहुँचाया करते है । यह सब सुनकर सन्यासी का चित्त उदास हो गया और उसने यात्रा करने का विचार त्यागकर मस्जिद में जाकर बाबा के श्री चरणों का स्पर्श किया । बाबा क्रोधित होकर कहने लगे – "इस निकम्मे सन्यासी को निकालो यहाँ से । इसका संग करना व्यर्थ है ।" सन्यासी बाबा के स्वभाव से पूर्ण अपरिचित था । उसे बड़ी निराशा हुई, परन्तु वहाँ जो कुछ भी गतिविधियाँ चल रही थी, उन्हें वह बैठे-बैठे ही देखता रहा । प्रातःकाल का दरबार लोगों से ठसाठस भरा हुआ था और बाबा को यथाविधि अभिषेक कराया जा रहा था । कोई पाद-प्रक्षालन कर रहा था तो कोई चरणों को छूकर तथा कोई तीर्थस्पर्श से अपने नेत्र सफल कर रहा था । कुछ लोग उन्हें चन्दन का लेप लगा रहे थे तो कोई उनके शरीर में इत्र ही मल रहा था । जातिपाँति का भेदभाव भुलाकर सब भक्त यह कार्य कर रहे थे । यद्यपि बाबा उस पर क्रोधित हो गये थे तो भी सन्यासी के हृदय में उनके प्रति बड़ा प्रेम उत्पन्न हो गया था । उसे यह स्थान छोड़ने की इच्छा ही न होती थी । दो दिन के पश्चात् ही मद्रास से पत्र आया कि उसकी माँ की स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है, जिसे पढ़कर उसे बड़ी निराशा हुई और वह अपनी माँ के दर्शन की इच्छा करने लगा, परन्तु बाबा की आज्ञा के बिना वह शिरडी से जा ही कैसे सकता था? इसलिये वह हाथ में पत्र लेकर उनके समीप गया और उनसे घर लौटने की अनुमति माँगी । त्रिकालदर्शी बाबा को तो सबका भविष्य विदित ही था । उन्होंने कहा कि "जब तुम्हें अपनी माँ से इतना मोह था तो फिर सन्यास धारण करने का कष्ट ही क्यों उठाया ? ममता या मोह भगवा वस्त्रधारियों को क्या शोभा देता है ? जाओ, चुपचाप अपने स्थान पर रहकर कुछ दिन शांतिपूर्वक बिताओ । परन्तु सावधान ! वाड़े में चोर अधिक है । इसलिए द्वार बंद कर सावधानी से रहना, नहीं तो चोर सब कुछ चुराकर ले जायेंगे । 'लक्ष्मी' यानी संपत्ति चंचला है और यह शरीर भी नाशवान् है, ऐसा ही समझ कर इहलौकिक व पालौकिक समस्त पदार्थों का मोह त्याग कर अपना कर्तव्य करो । जो इस प्रकार का आचरण कर श्रीहरि के शरणागत हो जाता है, उसका सब कष्टों से शीघ्र छुटकारा हो उसे परमानंद की प्राप्ति हो जाती है । जो परमात्मा का ध्यान व चिंतन प्रेंम और भक्तिपूर्वक करता है, परमात्मा भी उसकी अविलम्ब सहायता करते है । पूर्वजन्मों के शुभ संस्कारों के फलस्वरुप ही तुम यहाँ पहुँचे हो और अब जो कुछ मैं कहता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो और अपने जीवन के अंतिम ध्येय पर विचार करो । इच्छारहित होकर कल से भागवत का तीन सप्ताह तक पठन-पाठन प्रारम्भ करो । तब भगवान् प्रसन्न होंगे और तुम्हारे सब दुःख दूर कर देंगे । माया का आवरण दूर होकर तुम्हें शांति प्राप्त होगी ।" बाबा ने उसका अंतकाल समीप देखकर उसे यह उपचार बता दिया और साथ ही 'रामविजय' पढ़ने की भी आज्ञा दी, जिससे यमराज अधिक प्रसन्न् होते है । दूसरे दिन स्नानादि तथा अन्य शुद्घि के कृत्य कर उसने लेंडी बाग के एकांत स्थान में बैठकर भागवत का पाठ आरम्भ कर दिया । दूसरी बार का पठन समाप्त होने पर वह बहुत थक गया और वाड़े में आकर दो दिन ठहरा । तीसरे दिन बड़े बाबा की गोद में उसके प्राण पखेरु उड़े गये । बाबा ने दर्शनों के निमित्त एक दिन के लिये उसका शरीर सँभाल कर रखने के लिये कहा । तत्पश्चात् पुलिस आई और यथोचित्त जाँच-पडताल करने के उपरांत मृत शरीर को उठाने की आज्ञा दे दी । धार्मिक कृत्यों के साथ उसकी उपयुक्त स्थान पर समाधि बना दी गई । बाबा ने इस प्रकार सन्यासी की सहायता कर उसे सदगति प्रदान की ।

2. बालाराम मानकर
बालाराम मानकर नामक एक गृहस्थबाबा के परम भक्त थे । जब उनकी पत्नी का देहांत हो गया तो वो बड़े निराश हो गये और सब घरबार अपने लड़के को सौंप वे शिरडी में आकर बाबा के पास रहने लगे । उनकी भक्ति देखकर बाबा उनके जीवन की गति परिवर्तित कर देना चाहते थे । इसीलिये उन्होंने उन्हें बारह रुपये देकर मच्छिंद्रगढ़ (जिला सातार) में जाकर रहने को कहा । मानकर की इच्छा उनका सानिध्य छोड़कर अन्य कहीं जाने की न थी, परन्तु बाबा ने उन्हें समझाया कि तुम्हारे कलायाणार्थ ही मैं यह उत्तम उपाय तुम्हें बतलता रहा हूँ । इसीलिये वहाँ जाकर दिन में तीन बार प्रभु का ध्यान करो । बाबा के शब्दों में विश्वास कर वह मच्छिंद्रगढ़ चला गया और वहाँ के मनोहर दृश्यों, शीतल जल तथा उत्तम पवन और समीपस्थ दृश्यों को देखकर उसके चित्त को बड़ी प्रसन्नता हुई । बाबा द्वारा बतलाई विधि से उसने प्रभु का ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया और कुछ दिनों पश्चात् ही उसे दर्शन प्राप्त हो गया । बहुधा भक्तों को समाधि या तुरीयावस्था में ही दर्शन होते है, परन्तु मानकर जब तुरीयास्था से प्राकृतावस्था में आया, तभी उसे दर्शन हुए । दर्शन होने के पश्चात् मानकर ने बाबा से अपने को वहाँ भेजने का कारण पूछा । बाबा ने कहा कि, "शिरडी में तुम्हारे मन में नाना प्रकार के संकल्प-विकल्प उठने लगे थे । इसी कारण मैंने तुम्हें वहाँ भेजा कि तुम्हारे चंचल मन को शांति प्राप्त हो । तुम्हारी धारणा थी कि मैं शिरडी में ही विद्यमान हूँ और साढ़े तीन हाथ के इस पंचतत्व के पुतले के अतिरिक्त कुछ नही हूँ, परन्तु अब तुम मुझे देखकर यह धारणा बना लो कि जो तुम्हारे सामने शिरडी में उपस्थित है और जिसके तुमने दर्शन किये, वह दोनों अभिन्न है या नहीं । मानकर वह स्थान छोडकर अपने निवास स्थान बाँद्रा को रवाना हो गया । वह पूना से दादर रेल द्वारा जाना चाहता था । परन्तु जब वह टिकट-घर पर पहुँचा तो वहाँ अधिक भीड़ होने के कारण वह टिकट खरीद न सका । इतने में ही एक देहाती, जिसके कंधे पर एक कम्बल पड़ा था तथा शरीर पर केवल एक लंगोटी के अतिरिक्त कुछ न था, वहाँ आया और मानकर से पूछने लगा कि "आप कहाँ जा रहे है ?" मानकर ने उत्तर दिया कि, "मैं दादर जा रहा हूँ ।" तब वह कहने लगा कि, "मेरा यह दादर का टिकट आप ले लीजिये, क्योंकि मुझे यहाँ एक आवश्यक कार्य आ जाने के कारण मेरा जाना आज न हो सकेगा ।" मानकर को टिकट पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई और अपनी जेब से वे पैसे निकालने लगे । इतने में ही टिकट देने वाला आदमी भीड़ में कहीं अदृस्य हो गया । मानकर ने भीड़ में पर्याप्त छानबीन की, परन्तु सब व्यर्थ ही हुआ । जब तक गाड़ी नहीं छूटी, मानकर उसके लौटने की ही प्रतीक्षा करता रहा, परन्तु वह अन्त तक न लौटा । इस प्रकार मानकर को इस विचित्र रुप में द्वितीय बार दर्शन हुए । कुछ दिन अपने घर ठहरकर मानकर फिर शिरडी लौट आया और श्रीचरणों में ही अपने दिन व्यतीत करने लगा । अब वह सदैव बाबा के वचनों और आज्ञा का पालन करने लगा । अन्ततः उस भाग्यशाली ने बाबा के समक्ष ही उनका आशीर्वाद प्राप्त कर अपने प्राण त्यागे ।

3. तात्यासाहेब नूलकर
हेमाडपंत ने तात्यासाहेब नूलकर के सम्बन्ध में कोई विवरण नहीं लिखा है । केवल इतना ही लिखा है कि उनका देहांत शिरडी में हुआ था । साईलीला पत्रिका में संक्षिप्त विवरण प्रकाशित हुआ था, जो नीचे उद्घृत है – सन 1909 में जिस समय तात्यासाहेब पंढरपुर में उपन्यायाधीश थे, उसी समय नानासाहेब चाँदोरकर भी वहाँ के मामलतदार थे । ये दोनो आपस में बहुधा मिला करते और प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया करते थे । तात्यासाहेब सन्तों में अविश्वास करते थे, जबकि नानासाहेब की सन्तों के प्रति विशेष श्रद्घा थी । नानासाहेब ने उन्हें साईबाबा की लीलाएँ सुनाई और एक बार शिरडी जाकर बाबा का दर्शन-लाभ उठाने का आग्रह भी किया । वे दो शर्तों पर चलने को तैयार हुए –
उन्हें ब्राह्मण रसोइया मिलना चाहिये ।
भेंट के लिये नागपुर से उत्तम संतरे होने चाहिये ।
शीघ्र ही ये दोनों शर्ते पूर्ण हो गयी । नानासाहेब के पास एक ब्राह्मण नौकरी के लिये आया, जिसे उन्होंने तात्यासाहेब के पास भिजवा दिया और एक संतरे का पार्सल भी आया, जिस पर भेजने वाले का कोई पता न लिखा था । उनकी दोनों शर्ते पूरी हो गई थी । इसीलिये अब उन्हें शिरडी जाना ही पड़ा । पहले तो बाबा उन पर क्रोधित हुए, परन्तु जब धीरे-धीरे तात्यासाहेब को विश्वास हो गया कि वे सचमुच ही ईश्वरावतार है तो वे बाबा से प्रभावित हो गये और फिर जीवनपर्यन्त वहीं रहे । जब उनका अन्तकाल समीप आया तो उन्हें पवित्र धार्मिक पाठ सुनाया गया और अंतिम क्षणों में उन्हें बाबा का पद तीर्थ भी दिया गया । उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर बाबा बोल उठे – अरे तात्या तो आगे चला गया । अब उसका पुनः जन्म नहीं होगा ।

4. मेघा
28वे अध्याय में मेघा की कथा का वर्णन किया जा चुका है । जब मेघा का देहांत हुआ तो सब ग्रामबासी उनकी अर्थी के साथ चले और बाबा भी उनके साथ सम्मिलित हुए तथा उन्होंने उसके मृत शरीर पर फूल बरसाये । दाह-संस्कार होने के पश्चात् बाबा की आँखों से आँसू गिरने लगे । एक साधारण मनुष्य के समान उनका भी हृदय दुःख से विदीर्ण हो गया । उनके शरीर को फूलों से ढँककर एक निकट सम्बन्धी के सदृश रोते-पीटते वे मस्जिद को लौटे । सदगति प्रदान करते हुए अनेक संत देखने में आये है, परन्तु बाबा की महानता अद्वितीय ही है । यहाँ तक कि बाघ सरीखा एक हिंसक पशु भी अपनी रक्षा के लिये बाबा की शरण में आया, जिसका वृतान्त नीचे लिखा है -

5. बाघ की मुक्ति
बाबा के समाधिस्थ होने के सात दिन पूर्व शिरडी में एक विचित्र घटना घटी । मस्जिद के सामने एक बैलगाड़ी आकर रुकी, जिस पर एक बाघ जंजीरों से बँधा हुआ था । उसका भयानक मुख गाड़ी के पीछे की ओर था । वह किसी अज्ञात पीड़ा या दर्द से दुःखी था । उसके पालक तीन दरवेश थे, जो एक गाँव से दूसरे गाँव में जाकर उसके नित्य प्रदर्शन करते और इस प्रकार यथेएष्ठ द्रव्य संचय करते थे और यही उनके जीविकोवपार्जन का एक साधन था । उन्होंने उसकी चिकित्सा के सभी प्रयत्न किये, परन्तु सब कुछ व्यर्थ हुआ । कहीं से बाबा की कीर्ति भी उनके कानों में पड़ गई और वे बाघ को लेकर साई दरबार में आये । हाथों से जंजीरें पकड़कर उन्होंने बाघ को मस्जिद के दरवाजे पर खड़ा कर दिया । वह स्वभावतः ही भयानक था, पर रुग्ण होने के कारण वह बेचैन था । लोग भय और आश्चर्य के साथ उसकी ओर देखने लगे । दरवेश अन्दर आये और बाबा को सब हाल बताकर उनकी आज्ञा लेकर वे बाघ को उनके सामने लाये । जैसे ही वह सीढ़ियों के समीप पहुँचा, वैसे ही बाबा के तेजःपुंज स्वरुप का दर्शन कर एक बार पीछे हट गया और अपनी गर्दन नीचे झुका दी । जब दोनों की दृष्टि आपस में एक हुई तो बाघ सीढ़ी पर चढ़ गया और प्रेमपूर्ण दृष्टि से बाबा की ओर निहारने लगा । उसने अपनी पूँछ हिलाकर तीन बार जमीन पर पटकी और फिर तत्क्षम ही अपने प्राण त्याग दिये । उसे मृत देखकर दरवेशी बड़े निराश और दुःखी हुए । तत्पश्चात जब उन्हें बोध हुआ तो उन्होंने सोचा कि प्राणी रोगग्रस्त था ही और उसकी मृत्यु भी सन्निकट ही थी । चलो, उसके लिये अच्छा ही हुआ कि बाबा सरीखे महान् संत के चरणों में उसे सदगति प्राप्त हो गई । वह दरवेशियों का ऋणी था और जब वह ऋण चुक गया तो वह स्वतंत्र हो गया और जीवन के अन्त में उसे साई चरणों में सदगति प्राप्त हुई । जब कोई प्राणी संतों के चरणों पर अपना मस्तक रखकर प्राण त्याग दे तो उसकी मुक्ति हो जाती है । पूर्व जन्मों के शुभ संस्कारों के अभाव में ऐसा सुखद अंत प्राप्त होना कैसे संभव है?

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 9 November 2011

साईं पर विश्वास रख

ॐ साईं राम


साईं साईं जप ले बन्दे, मूल्य लगे न कोये
साईं सब कुछ जानते हैं, उनसे छुपा न होये
क्या पाप क्या पुण्य हैं तेरे, सबका है वहां खाता
कर्मों का फल सबको मिलता, कोई बच न पाता


साईं अपने भक्तों को छप्पड़ फाड़ के दे, 
कोई करे अभिमान तो थप्पड़ मार के ले
बचना है यम के फंदे से तो साईं साईं बोल,
भक्ति कर ले साईं की भीतर के पट खोल
यम की मार से बच सके कोई नहीं उपाय,
यम के फंदे से तो मेरा साईं ही बचाये
साईं कृपा पानी है तो जीवन को सुधार,
साईं पर विश्वास रख वो सबका करें उद्धार

*श्री सच्चिदानंद सद्गुरु श्री साईं नाथ महाराज की जय*

Tuesday, 8 November 2011

शिर्डी में दीपावली उत्सव की कुछ तस्वीरें

 - SHIRDI DEEPAVALI FESTIVAL`2011 CELEBRATIONS - 



Sai Baba in his life time had lit diyas (Lamps) with water when the shopkeepers had refused to give him Oil for the same. 
Remembering this miracle, on 26th Oct`2011, in celebration of 'Deep Utsav' or 'Deepavali', the Festival of Lights,
 thousands of devotees reached Shirdi and lit Oil Diyas (Lamps) / Candles in the premises of the Sai Baba Temple.

Devotees gathered at Lendi Garden and also infront of Baba's Dwarkamai.to light (Diyas) Oil Lamps / Candles all over. 
With thousands of burning oil Lamps, the view was really mesmerizing.

Deepavali Puja-n-Darshan Schedule @ Shirdi Sai Temple was: 
1) From 16:30 pm to 17:00 pm - Laxmi Pujan, 
                    2) From 17:00 pm to 17:55 pm - Ganesh/Laxmi Kuber/Saraswati Pujan & Dhoop/Deep to Baba. 
                  3) From 18:00 pm to 18:25 - Darshan Began with Sai Baba's Dhoop Arat
4) From 18:35 pm to 18:40 pm Naivedhya.
5) At 22:00 pm Darshan Time Ends.





- Note - 
Till a couple of years back, devotees were allowed to light oil lamps inside Dwarkamai,
but this custom has now been stopped because of Fire safety measures 
as well as a risk to fellow devotees who could slip on the Oil fallen down from the Lamps.
Some devotees who disapproved said that at-least a few oil Lamps should be allowed to be lit inside Dwarkamai.
But then these devotees should also keep in mind that with thousands of devotees visiting Shirdi during Deepavali, 
it would result in a total chaos with all wanting to light a Lamp inside Dwarkamai. 

Remember:
Burning of Lamps in Lendi Garden or outside Dwarkamai is no different to burning them inside Dwarkamai, 
as Sai Baba is omnipresent in each-n-every corner of Shirdi.



- CATCH THE VIDEOS @ - 




 





- LENDI GARDEN - 












- OUTSIDE DWARKAMAI - 













 

साईं साईं का गान कर

ॐ साईं राम


साईं जी छोड़ें नहीं, अपने भक्तों का हाथ
बाबा अपने भक्तों के, सदा ही रहते साथ
बाबा यह मानव नहीं, हैं ईश्वर अवतार
कलयुग में यह प्रकट हुए, ईश्वर हैं साक्षात
बाबा दूर न कभी हुए, गुण गा के देख ले
अगर नहीं विश्वास हो, आजमा के देख ले
निश्छल भक्ति वही है, जो प्रेम भाव से हो
 आते हैं साईं तभी, जब मन में श्रद्धा हो
भक्तों के कल्याण को, बाबा दौड़े आयें
सच्चे भक्तों के लिए प्रभु, यम से भी लड़ जायें
बाबा प्रकट हुए थे, नीम के पेड़ तले
 पेड़ के पत्ते मीठे हैं, देख ले चाहे भले
साबुन से स्नान कर, मन की मैल न धोये
साईं साईं का गान कर, तन मन पावन होये

श्री सच्चिदानंद सद्गुरु साईं नाथ महाराज की जय


Monday, 7 November 2011

साईं का मान करो

ॐ साईं राम
 साईं का मान करो , साईं का सम्मान करो साईं का तह दिल से सत्कार करो, किस्मत वाले है जिन्हें मिलता है साईं का प्यार और आशीर्वाद, एक सचे और पवित्र रिश्ते का साथ साईं अनमोल है, संस्कारो की उडती धूल है, इस धूल को अपने मस्तक पर सजा लो अपने साईं को अपना बना लो, खोल लो अपने दिल के दरबार ...जड़ वालो एक ही नाम, जय साईंराम जय साईंराम तीन अक्षर को करू प्रणाम सब बोलो जय साईंराम, जय साईंराम जय साईंराम जय साईंराम


Sunday, 6 November 2011

साईं मुख वचन

ॐ साईं राम


पीसने का अभिप्राय गेहूँ से नहीं, वरन् अपने भक्तों के पापो, दुर्भाग्यों, मानसिक तथा शाशीरिक तापों से था । उनकी चक्की के दो पाटों में ऊपर का पाट भक्ति तथा नीचे का कर्म था । चक्की का मुठिया जिससे कि वे पीसते थे, वह था ज्ञान । बाबा का दृढ़ विश्वास था कि जब तक मनुष्य के हृदय से प्रवृत्तियाँ, आसक्ति, घृणा तथा अहंकार नष्ट नहीं हो जाते, जिनका नष्ट होना अत्यन्त दुष्कर है, तब तक ज्ञान तथा आत्मानुभूति संभव नहीं हैं ।

-: साईं मुख वचन :-
 "चक्की के केंद्र मे जो ज्ञानरूपी दंड है, उसी को कस कर पकड़ लो, जिस प्रकार तुम मुझे करते देखते हो ! सिर्फ केंद्र की ओर अग्रसर होते जाओ और तब यह निश्चित है की तुम इस भवसागर रुपी चक्की से अवश्य बचोगे"

 

जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता

ॐ साईं राम

जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता दुनियां छूटी जाय
हम आऐ सांई के द्वारे धरती कहीं भी जाय

चहूं ओर तूफ़ान के धारे,मैली हवा वीरान किनारे
जीवन नैया सांई सहारे फिर भी चलती जाय
जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता दुनिया छूटी जाय

नाम सिमर ले जब तक दम है,बोझ ज़ियादा वक्त भी कम है
याद रहे दो दिन की उमरिया पल पल घटती जाय
जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता दुनिया छूटी जाय

सांई के मंदिर में आए जब श्रद्दा के हार चढ़ाए
मन विश्वास के फूल की रंगत और निखरती जाय
जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता दुनिया छूटी जाय

भक्तों को दर्शन भिक्षा दो,रक्षा की ठंडक पहुंचा दो
तुम ही कहो ये बिरहा की अग्नि कब तक जलती जाय
जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता दुनिया छूटी जाय
हम आए सांई के द्वारे धरती कहीं भी जाय...

शिरडी तीर्थ स्थान

ॐ सांई राम





शिरडी तीर्थ स्थान

साईं बाबा का निवास स्थान होने के कारण शिरडी की प्रसिद्धि देश भर में फैली है और शिरडी को लोग तीर्थ स्थान मानते हैं। शिरडी में यात्रियों, दर्शकों और भक्तों के ठहरने के लिये एक ही स्थान था जिसका नाम “साठे का बाड़ा” था। हरि विनायक साठे ने नीम पेड़ के आसपास की जमीन खरीद कर वहाँ लोगों के ठहरने के लिये एक बाड़ा बनवा दिया। नीम वृक्ष को चबूतरे से घेर दिया। सन् 1909 ई. में नाना साहब चान्दोरकर के कहने पर बम्बई के सालिसिटर हरि सीताराम उर्फ काका साहब दीक्षित साईं बाबा के दर्शन के लिये शिरडी आये। वे एक बार लन्दन में ट्रेन से गिर गये थे जिससे उनके एक पैर में लंगड़ापन आ गया था। जब वे साईं बाबा से मिले तब उन्होंने कहा कि “पाँव के लँगड़ेपन की कोई बात नहीं है, मेरे मन के लंगड़ेपन को दूर कर दीजिये।” साईं बाबा की कृपा से काका साहब दीक्षित के पैर और मन दोनों का लंगड़ापन ठीक हो गया। काका साहब दीक्षित इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने साईं बाबा के निकट शिरडी में ही रहने का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपने रहने और दूसरे भक्तों के ठहरने के लिये एक बाड़ा शिरडी में बवनाया जो “दीक्षित बाड़ा” के नाम से जाना जाता है। नागपुर के धनी श्रीमान बापू साहब बूटी को साईं बाबा ने एक बार आँव की भयंकर बीमारी से और दूसरी बार हैजे से ठीक कर दिया। बापू साहब बूटी ने करोड़ों रुपये खर्च कर शिरडी में बाड़ा बनवा दिया। इस प्रकार शिरडी में तीन बाड़ा हो गये जहाँ आगन्तुक भक्त ठहरने लगे।
श्रीमान बूटी ने भव्य बाड़ा उसी स्थान पर बनवाया जहाँ पर साईं बाबा के परिश्रम से फूलों का बगीचा तैयार हो गया था। बापू साहब बूटी के उसी बाड़े में साईं बाबा का समाधि मन्दिर स्थित है जहाँ प्रतिदिन हजारों यात्री दर्शन करने के लिये आते हैं। साईं बाबा तो अन्तर्यामी थे। ऐसा लगता है कि उन्हें पहले से ही ज्ञात था कि उनका समाधि मन्दिर वहीं बनेगा। तभी तो पहले वहाँ उनके करकमलों से बगीचा लगा और बाद में वहीं उनकी समाधि बनी। अपनी मना समाधि के कुछ वर्ष पहले साईं बाबा ने कहा था, “मेरे संसार से चले जाने के बाद भी मैं अपने समाधि के माध्यम से बात करूँगा।” उनकी यह भविष्यवाणी सच हुई। वे आज भी अपने भक्तों को नये नये अनुभव कराते हैं।





आपने कभी साईं को देखा है ?
साईं गरीबो का ...........
साईं को पाना हैं या मिलना हैं तो किसी गरीब की मदद
कर के देखो वहां से साईं की झलक उस मददगार को होगी
यकीन न हो तो आजमा के देखो.............


Saturday, 5 November 2011

श्रद्धा और आनंद

ॐ साईं राम

साईं तेरी कृपा से, मिले मुझे दो जन 
तेरे जैसी सूरत उनकी, तेरे जैसा मन
उनके नाम भी तेरे जैसे श्रद्धा और आनंद  
उनको सारी ख़ुशियाँ देना, न देना कोई ग़म
अगर हे प्रभु साईं मेरे, दुःख कोई उनको आये
मेरी ख़ुशियाँ उन्हें दे देना, दुःख मुझे मिल जाये 
है साईं इच्छा मेरी, द्वार मैं तेरे आऊं
झोली भर के ख़ुशियों की, उनके लिए ले जाऊं 
मेरे आनंद भाई सदा ही, गुण तेरे ही गायें 
गुण गाते गाते प्रभु, दास गनु बन जायें
मेरी बहन के लिए क्या मांगूं , मेरी नहीं औक़ात
उनको नवधा भक्ति देना प्रेम भरी सौग़ात

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एक 18 साल का लड़का ट्रेन में खिड़की के पास वाली सीट पर बैठा था. अचानक वो ख़ुशी में जोर से चिल्लाया "पिताजी, वो देखो, पेड़ पीछे जा रहा हैं". उसके पिता ने स्नेह से उसके सर पर हाँथ फिराया. वो लड़का फिर चिल्लाया "पिताजी वो देखो, आसमान में बादल भी ट्रेन के साथ साथ चल रहे हैं". पिता की आँखों से आंसू निकल गए. पास बैठा आदमी ये सब देख रहा था. उसने कहा इतना बड़ा होने के बाद भी आपका लड़का बच्चो जैसी हरकते कर रहा हैं. आप इसको किसी अच्छे डॉक्टर से क्यों नहीं दिखाते?? पिता ने कहा की वो लोग डॉक्टर के पास से ही आ रहे हैं. मेरा बेटा जनम से अँधा था, आज ही उसको नयी आँखे मिली हैं. #नेत्रदान करे. किसी की जिंदगी में रौशनी भरे.